बाजरे का पौधा

– मालिनी गौतम

गमले में अपने आप ही उग आया था

बाजरे का पौधा

हां, कोई भला क्यों कर उगाएगा

बाजरे की फसल गमले में?

blade of pearl millet
Photo by Ranjeet Chauhan on Pexels.com

माना कि मिलेट ईयर घोषित हुआ है यह बरस

मगर इसका मतलब यह तो नहीं

कि गमले में ही उगा लिया जाए बाजरा.

ये तो चिड़िया, कबूतर, गिल्लू के लिए

बगीचे में लटका हुआ था

बाजरे से भरा सकोरा,

वे कुछ खाते और कुछ गिराते

कुछ दाने वहीं गिर गये आसपास रखे गमलों में

और उग आए बाजरे के पौधे.

पहले पहल तो मैं घास ही समझ बैठी थी उन्हें

लेकिन जब निकल आईं बालियां

तो मन न जाने कैसी अद्भुत खुशी और संतोष से भर उठा.

उन दो-चार बालियों से कोई अन्न का कोठार

तो भर नहीं जाना था

मगर मैं फिर भी हुलस-हुलसकर देखती रही

उन बालियों में दानों का भरना

बालियों का पकना

जब एक रात तेज़ बारिश से झुक गईं बालियां

तो पतली डंडी का सहारा भी दिया

सब हंसते रहे यह कहकर

कि अब इन चार चपटी दानों का

आटा भी पिसवाओगी क्या?

नहीं, मैं बस सहेज लूंगी उन्हें

लगा लूंगी सिर माथे पर

जतन करुंगी उन्हें

कुछ अधिक वक्त सहेजने का.

किसान नहीं हूं मैं

मगर अपने चार पौधों से प्रेम था मुझे

उन दानों को फिर डाल दूंगी माटी के सकोरे में

खिला दूंगी दूर देस से दाना चुगने आए पंछियों को

मैं भीग जाऊंगी अपनी फसल के प्रेम में

यह सोचते हुए कि

किसान कितना भीगता होगा

अपने दूर तलक लहराते हुए

हरे छम खेतों के प्रेम में.

Translate »