भारत की संस्कृति से भिन्न है अमेरिका का महिला अधिकार दिवस

(28 अगस्त विश्व महिला अधिकार दिवस)पंकज चतुर्वेदी

अमेरिका में लोकतंत्र का प्रारंभ पहले राष्ट्रपति की नियुक्ति अर्थात सन 1781 से माना जाता है, लेकिन विडंबना है कि खुद को अत्याधुनिक कहने वाले इस विशाल देश में सन 1920 तक वहां की आधी आबादी अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित थी, ना वे मतदान कर सकती थीं, ना ही निर्वाचन में हिस्सा ले सकती थीं, उनके काम के घंटों व पारिश्रमिक के मामले में भी भेदभाव था. लगभग 72 साल के लंबे संघर्ष के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के तीन चौथाई राज्य इस बात पर सहमत हुए कि औरतें भी पुरुष के बराबर की ही इंसान हैं. 26 अगस्त 1920 को अमेरिका की संसद या सीनेट ने सभी राज्यों से प्राप्त सहमति के बाद संविधान में 19वां संशोधन कर औरतों को पुरुष के समान अधिकार देने की शुरुआत की. इसी दिवस की याद में सन 1971 से महिला समानता दिवस मनाया जाने लगा. भारत में अमेरिका/यूरोप के देशों के प्रचलनों की नकल कर खुद को आधुनिक सिद्ध करने को गर्व से देखा जा सकता है, सो पहले से ही सुविधा-संपन्न, सक्षम,कुछ महिलाएं यहां भी इस दिवस को मनाती हैं. यह भी सही है कि समानता की गूंज ना तो संसद में सुनाई देती है और ना ही दूरस्थ उन इलाकों में जहां अभी भी बेटी के जन्म पर नाखुशी होती है.

हालांकि अमेरिका में इस बिल का पास होना भी बेहद टकराव पूर्ण था. टेनेसी राज्य के दस्तावेजों का एक पैकेज वाशिंगटन में सुबह 4 बजे के आसपास ट्रेन से पहुंचा था. इसमें राज्य विधानमंडल के आधिकारिक अनुसमर्थन के दस्तावेज थे. 18 अगस्त, 1920 को टेनेसी संशोधन को समर्थन करने वाला 36 वां राज्य कैसे बना, यह अपने आप में एक कहानी थी. कांग्रेस ने एक साल पहले प्रस्तावित संशोधन पारित किया था, और इसे राष्ट्रपति वुडरो विल्सन का समर्थन प्राप्त था.

1920 के मध्य तक, 35 राज्यों ने संविधान संशोधन की पुष्टि के लिए मतदान किया था, लेकिन चार अन्य राज्यों-कनेक्टिकट, वर्मोंट, उत्तरी कैरोलिना और फ्लोरिडा ने विभिन्न कारणों से प्रस्ताव पर विचार करने से इनकार कर दिया, जबकि शेष राज्यों ने संशोधन को पूरी तरह से खारिज कर दिया था. इसलिए, टेनेसी युद्ध का मैदान बन गया ताकि संशोधन की पुष्टि के लिए आवश्यक तीन-चौथाई राज्यों हो सकें. 24 वर्षीय विधायक हैरी टी बर्न को संशोधन के खिलाफ मतदान करने के लिए राजी किया गया था, लेकिन वे अपनी मां के अनुरोध को नहीं टाल सकीं और एन वक्त पर उन्होंने संशोधन के समर्थन में वोट दे कर इतिहास बदल दिया.

भारत में औरतों को संवैधानिक संस्थओं में समान स्थान बनाने को इतना संघर्श नहीं करना पड़ा. हमारे संविधान की मूल भावना में ही हर तरीके के समानता का अधिकार है. शायद इसका कारण देश की संस्कृति भी है, जहां आस्था-स्थलों पर पुरुष देवताओं के ठीक बगल में महिला देवियों की समान ऊंचाई की प्रतिमाओं की स्थापना, उनकी एक समान पूजा करने की प्राचीन परंपरा है. भारत में स्त्री को शक्ति का रूप बताने के कई आख्यान हैं.

भारत जिस ब्रिटेन का उपनिवेश था, वहां महिलाओं को मतदान का अधिकार 1929 में मिला, जबकि भारत में स्वतंत्रता के पहले कदम से ही महिलाओं को चुनाव लड़ने या मतदान करने का समान अधिकार था. हमारी पहली निर्वाचित संसद(1952) में 24 महिला सांसद थीं. हमारे महज 70 साल के संसदीय अतीत में देश ने एक प्रधानमंत्री, एक राष्ट्रपति, दो लोकसभा अध्यक्ष सहित लगभग सभी प्रमुख पदों पर महिलाओं को विभूषित होते देखा है. जाहिर है कि जिन मसलों को ले कर अमेरिका ने 26 अगस्त को महिला समानता दिवस मनाने की घोषणा की, वह भारत में प्रासंगिक नहीं हैं, फिर भी भारत में यह मसला अपने ही विरोधाभास का शिकार है.

तस्वीर इतनी उजली भी नहीं हैं. संसद में ना जाने कितने विवादास्पद मसले व बिल लगभग एकमत से इस बार पास हो गए लेकिन कोई दो दशक से लटका महिला आरक्षण बिल कहीं ठंडे बस्ते में हैं. हमनें स्थानीय निकायों में तो महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दे कर उनके यहां से नेतृत्व की बड़ी व औजस्वी पीढ़ी को लिए रास्ता खोल दिया, लेकिन विधान सभा या लोकसभा में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण के मसले पर सभी मौन हैं.

12 सितंबर 1996 को पहली बार संसद में प्रस्तुत महिला आरक्षण बिल पर या तो चर्चा होती नहीं, जब होती है तो वह हंगामे का शिकार हो जाता है. कहने की जरूरत नहीं है कि बीते कई दशकों के दौरान राजनीतिक दलों की सीमाओं से परे, महिला मंत्रियों ने बनिस्पत बेहतर काम किए हैं और उन पर आरोप भी कम लगे. इसके बावजूद मौजूदा लोकसभा में कुल 543 में से मात्र 66 अर्थात महज 12 प्रतिशत ही महिला सांसद हैं. आज आवश्यकता है कि संसद व विधानसभाओं में भी पूर्व निर्धारित अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण के साथ महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिले ताकि समाज के सभी वर्ग से महिला सांसद चुन कर देश की आवाज बनें.

जान कर आश्चर्य होगा कि भारत की तुलना में बेहद पिछड़े कहे जाने वाले कई देशों में औरतों के लिए आरक्षण का प्रावधा है. अर्जेटीना में 30 प्रतिशत, अफगानिस्तान में 27 प्रतिशत, पाकिस्तान में 30 प्रतिशत एवं बांग्लादेश में 10 प्रतिशत महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं. यूरोप के कई देशों में राजनीतिक दल हैं जैसे कि – डेनमार्क (34 प्रतिशत), नार्वे (38 प्रतिशत), स्वीडन (40 प्रतिशत), फिनलैंड (34 प्रतिशत) तथा आइसलैंड (25 प्रतिशत) आदि. भारत में पिछले विधान सभा चुनाव में ओड़िशा में बीजू जनता दल ने 33 प्रतिशत आरक्षण का फार्मूला लागू किया व वह सफल भी हुआ. हमारे देश में जिन स्थानों पर अभी महिलाओं के लिए समान अधिकार के लिए कड़ाई से काम करना है, उसमें शिक्षा प्रमुख है. भारत में 74 प्रतिशत साक्षरता दर की तुलना में महिला साक्षरता दर 64 प्रतिशत है. महिलाओं की आर्थिक भागीदारी 42 प्रतिशत हैं, जबकि विकसित देशों में यह 100 प्रतिशत पहुंच रही हैं. कामकाज में भारतीय महिलाओं की भागीदारी मात्र 28 प्रतिशत हैं, जबकि हमारे पड़ोसी बांग्लादेश में भी यह 45 प्रतिशत है.

यह हमारे लिए गौरव की बात है कि अब बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए समाज सकारात्मक है, सरकारी ही नहीं, निजी संस्थानों में महिलाएं शीर्ष पदों पर हैं. लड़कियों को जन्म के समय ही मार देने के लिए कुख्यात हरियाणा में प्रमुख सचिव, अतिरिक्त प्रमुख सचिव सहित लगभग सभी अग्रिम प्रशासनिक पदों पर इस समय महिलाएं सुशोभित हैं. परंतु यह भी सत्य है कि जिन समाजों में अभी तक मध्य वर्ग विकसित नहीं हो पाया, वहां घर के भीतर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कपड़े पहनने, घर से बाहर निकलने जैसी बातों में बच्चियों के साथ भेदभाव होता है. यौन अत्याचार, एसिड अटैक, गर्भ में बच्ची की हत्या, बाल विवाह और शारीरिक शोषण जैसे कुछ ऐसे मसले हैं जहां किसी कानून की जगह समाज को संवेदनशील बनाने का सही समय हमारे लिए आ गया है. भारत में 2016 में मानव तस्करी के 15 हजार मामले दर्ज़ किए गए जिनमें से दो तिहाई महिलाओं से जुड़े थे.

भारत में महिला समानता के मुद्दे, समाधान, सरोकार अमेरिका, यूरोप से बहुत अलग हैं. हमारा सामाजिक, आर्थिक व लोकतांत्रिक ताना-बाना उनसे बेहतर व जुदा है. जाहिर है हमें अपने किसी चरित्र- अहिल्याबाई, रानी दुर्गावती, ज्योतिबा फुले, कस्तूरबा में से किसी के जन्मदिन पर महिला समानता दिवस अपने मुद्दों के साथ मनाने पर विचार करना चाहिए.

Translate »