– तूलिका मिश्र

फ़रवरी के प्रेम से सराबोर मलयांचल बयारों के बाद आता है मार्च का महीना– महिलाओं का महीना, महिला सशक्तिकरण का सांकेतिक महीना. आज जब प्रेम और विवाह में पुरुष और स्त्रियों के ताल-मेल का इतना अभाव है, जब प्रेम और विवाह की परिभाषा सहिष्णुता, सहजता से परे है, जहां भौतिकता नैसर्गिकता को धकेल सर्वोच्च स्थान पर बैठी है, स्त्री और पुरुष दोनों ही अपने मौलिक गुणों को अस्वीकार करते दिख रहे , जहां पुरुषों का पुरुषोचित सौंदर्य तथा स्त्रियों के स्त्रियोचित सौंदर्य क्षीण होते जा रहे हैं, वहां संसर्ग, रिश्ते, प्रेम और विवाह की परिभाषा भी स्वाभाविक है बदलती जा रही है. क्यों स्त्री का स्थान आज भारत और विश्व में बदल गया, क्यों आज नारी को जो शुरू से सर्वोपरि स्थान मिला था उसके लिए उन्हें गुहार लगानी पड़ रही है? आज के आधुनिक युग में भी नारे लगाती औरतों की स्वतंत्रता की मांग, समाज में एक विशेष स्थान की मांग, तलाक और टूटते रिश्तों की दिनानुदिन बढ़ती संख्या, एक बार फिर मुझे साहित्य की तरफ खींचती है क्योंकि आधुनिकता ने तो रिश्तों की मर्यादा ही समाप्त कर दी.
जब विज्ञान हार जाता है, साहित्य उसे संभालता है. बदलते हुए परिवेश में विचलित होना स्वाभाविक है ऐसे में पीछे मुड़कर अपने धर्म, अपने साहित्य, अपने लोक गीतों में ही संभावनाएं दिखाई देने लगती हैं. परिवर्तन भले ही परंपरा को समेट ले परन्तु परंपरा प्रत्येक युग में जीवित रहती है, रहनी भी चाहिए क्योंकि ये ही हमें जीने का एक आधार प्रदान करती है.
प्रेम शब्द सुनते ही साहित्य की अनेक रचनाएं, चरित्र मन में कौंधने लगती हैं– आखिर प्रेम में भी मापदंड तो तय करते हैं ये चरित्र. कभी दिनकर की ‘उर्वशी’ जो प्रेम और सौंदर्य का काव्य है और प्रेम और सौंदर्य की मूल धारा में हमारे जीवन में प्रेम को एक प्रकार से परिभाषित करती है, तो कभी उपमा–अलंकारों से लैस कालिदास का प्रेम, और सौंदर्य और अभिजात्य से परिपूर्ण “शकुंतला”. राधा–कृष्ण के पारलौकिक प्रेम की तो बात ही क्या. अधिकांश प्रेम पर आधारित काव्यों में स्त्री की एक अहम् भूमिका रही है, और जब भी हम इन रचनाओं को पढ़ते हैं, इन चरित्रों को समीप से जानने की कोशिश करते हैं, हम देखते हैं कि यहां नैसर्गिक सौंदर्य की ही बात हो रही है- कृत्रिमता से कोसों दूर.

इनमें एक और ख़ास बात कि उस युग में जब औरतों की स्वतंत्रता पर कोई बहस नहीं थी, उनके अस्तित्व पर कोई ख़तरा नहीं था, स्त्री एक अत्यंत सुदृढ़ चरित्र बनकर ही सामने आई, वो बस एक नायिका नहीं, अपितु प्रेम के दो किरदारों में एक अधिक सशक्त चरित्र बन कर अनेक आयामों को लिए उभर कर आई. इतनी सशक्त कि वो मात्र सौंदर्य की मूरत नहीं, तेरहों कला से परिपूर्ण, विद्या की धनी ,स्वाभिमान से ओतप्रोत एक अत्यंत गरिमामयी चरित्र बनकर सामने आती हैं. प्रेम में लिप्त होकर भी इनके किरदारों में कभी स्वाभिमान की कमी या अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति उदासीनता कतई नहीं दिखती, प्रेम में बिलकुल मर्दों के साथ बराबर की हिस्सेदार पाई गयीं, हमेशा अर्धांगिनी बनी ही पायी गयीं. ऐसे में नारी, जयशंकर प्रसाद जी की पंक्तियां-
“नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग पग तल में.
पीयूष स्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुंदर समतल में.”
के विपरीत एक हद तक ही “केवल श्रद्धा” और पीयूष का झरना हैं. वो इन सब के साथ वो सब हैं जो उनके प्रेमी हैं, वैसी ही हैं जैसा उनके साथ उनके जीवन के सहचर हैं. तभी ऐसी स्त्रियों को बराबर का मान मिला, सम्मान मिला, साहित्य में, इतिहास में और हम सब के मानस पटल पर भी.
इसलिए मुझे मार्च के महीने में यानि औरतों के लिए समर्पित महीने में, शिवरात्रि के महीने में एक बार फिर साहित्य और लोक गीतों के जरिये, शिव स्मरण होते हैं. शिव, जो प्रेम और सौंदर्य की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति हैं, और शिव-पार्वती की जोड़ी प्रेम, विवाह और विश्वास का एक अतुलनात्मक उदाहरण है. शिव को याद करते ही स्मरण आता है महाकवि विद्यापति का, जिनकी रचनाएं छः शताब्दी गुज़रने के बावजूद आज भी प्रसांगिक हैं. उनकी रचनाओं ने लोक जीवन के एक प्रमुख पक्ष को आधार बनाकर अनेकों सामजिक संरचना तथा संचालन में इसके महत्व इत्यादि बिंदुओं पर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने एवं उसका विश्लेषण करने का प्रयास किया है. विद्यापति के गीतों में वर्णित सामाजिक कुरीतियां एवं जनमानस के आम जीवन में फैली कुरीतियों ने हमें सोचने पर विवश कर दिया है.

मैथिली कविता पर मेरे विश्लेषणों की श्रृंखला में, दूसरे स्थान पर कवि कोकिल विद्यापति की ‘नचारी’ है. मैं फिर स्पष्ट करना चाहूंगी कि मैं इसे हिंदी में पाठकों तक व्यापक पहुंच के लिए लिख रही हूं ताकि मैथिली के महान कवियों की रचनाएं और उनका विश्लेषण भारत के हर भाषाई वर्ग तक पहुंचे. ‘महेशवानी’ के अंतर्गत विद्यापति के कई लोक गीत हैं जो शिव और पार्वती की कथाओं को आम लोगों में प्रचलित करते हैं. सुनने-पढ़ने वाले इन्हें अपने मनोभाव और मानसिक आवश्यकताओं के अनुसार ग्रहण करते हैं और उनका विश्लेषण करते हैं. ऐसा ही एक गीत जो मुझे व्यक्तिगत रूप से हमेशा से झकझोरता रहा है, वह है-
“आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागल हे।
तोहे सिव धरु नट भेस कि डमरू बजाबह हे.
तोहे गौरी कहैछह नाचय हमें कोना नाचब हे,
चारि सोच मोहि होए कोन बिधि बाँचब हे.
अमिअ चुमिअ भूमि खसत बघम्बर जागत हे,
होएत बघम्बर बाघ बसहा धरि खायत हे.
सिरसँ ससरत साँप पुहुमि लोटायत हे,
कातिक पोसल मजूर सेहो धरि खायत हे.
जटासँ छिलकत गंगा भूमि भरि पाटत हे,
होएत सहस मुखी धार समेटलो नही जाएत हे.
मुंडमाल टुटि खसत, मसानी जागत हे,
तोहें गौरी जएबह पड़ाए नाच के देखत हे.
भनहि विद्यापति गाओल गाबि सुनाओल हे,
राखल गौरी केर मान चारु बचाओल हे”. ( कवि विद्यापति)
कवि की इन पंक्तियों में पार्वती शिव से कहती हैं कि आज एक महान व्रत का मुहूर्त है और उन्हें अथाह सुख की अनुभूति हो रही है, आप नटराज का वेष धारण कर डमरू बजाएं और मुझे नृत्य दिखाएं. गौरी के इस आग्रह को सुन शिव उनसे कहते हैं कि वो विवश हैं क्योंकि नृत्य के फलस्वरूप संभावित चार खतरों से वो ख़ास कर चिंतित हैं जिससे सृष्टि का बचना मुश्किल हो जायेगा. प्रथम कर्म में नृत्य से उनके सर पर चंद्रमा से जो अमृत बूंदें टपकेंगी, उससे उनका बाघम्बर जीवित हो, बाघ बन जायेगा और उनके बैल नंदी को खा जायेगा. दुसरे, नृत्य के क्रम में उनकी जटाओं में लिपटे सर्प भूमि पर गिर जायेंगे और कार्तिकेय के पाले हुए मयूर उन्हें मार डालेंगे. तीसरा, नाचते वक़्त उनकी जटा से छलक कर गंगा भी नीचे गिर पड़ेंगी और उनकी सहस्र धाराएं बह निकलेंगी जिन्हें संभालना बहुत मुश्किल हो जायेगा. चौथे, नाचने से उनके गले में पड़ा मुंडों का माला भी टूट कर बिखर जायेगा और सारे प्रेत जीवित हो उठेंगे जिससे भयभीत हो पार्वती ही डर कर भाग जाएंगी तो फिर उनका नृत्य भला देखेगा कौन? विद्यापति अंत में कहते हैं कि नटराज फिर भी अपनी पत्नी का मान रखते हुए नृत्य करते हैं और सारे संभावित खतरों को संभाल भी लेते हैं.
विद्यापति के शिव इस गीत में देवों के देव नहीं बल्कि मनुष्य रूप में एक साधारण पति हैं जो अपनी पत्नी के अनुरोध पर विवशताओं को संभालते हैं, उसकी मान की रक्षा करते हुए नट रूप धारण कर नृत्य दिखाते हैं और पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हैं.
इस लोकगीत में शिव एक आम पति हैं और गौरी एक पत्नी और इस रूप में अगर हम इस गीत का विश्लेषण करते हैं तो जो सामने आता है वो है स्त्रियों का पति के समकक्ष स्थान, पति के ह्रदय में उनके लिए सम्मान, पत्नी की इच्छा पूर्ति पति के लिए कर्त्तव्य बन जाना और सर्वप्रमुख ये कि यदि पति और पत्नी में तारतम्य रहे तो संसार की सारी विवशताएं धूमिल पड़ सकती हैं, वीभत्सता एक अभूतपूर्व रम्यता में बदल सकती है.
विद्यापति रचित इस कविता में शिव और पार्वती का संवाद केवल एक पारलौकिक कथा नहीं है, बल्कि इसमें दांपत्य जीवन, स्त्री-पुरुष संबंधों और सृष्टि के संतुलन का गहरा दार्शनिक संदेश निहित है. यह गीत शिव के नटराज रूप की लीला का वर्णन करता है, परंतु इसे केवल पौराणिक दृष्टि से देखने पर इसकी गहराई अधूरी रह जाती है. वास्तव में, यह एक ऐसा काव्य है, जिसमें समाज, मनोविज्ञान और दर्शन का समावेश है.
नृत्य और सृष्टि का संतुलन
शिव का नृत्य केवल एक कलात्मक क्रिया नहीं है, यह संपूर्ण सृष्टि की ऊर्जा और गति का प्रतीक है. शिव के हर नृत्य में सृजन और संहार दोनों निहित हैं. परंतु यहां, शिव स्वयं इस नृत्य को रोकने का प्रयास करते हैं, क्योंकि उनकी गति से संपूर्ण विश्व प्रभावित हो सकता है. यह इंगित करता है कि शक्ति का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, अन्यथा अस्तित्व संकट में पड़ सकता है.
पति-पत्नी का संवाद और परस्पर सम्मान
पार्वती का आग्रह और शिव की विवशता केवल एक पौराणिक कथा भर नहीं है; यह एक दांपत्य जीवन का यथार्थ चित्रण भी है. पति-पत्नी के बीच प्रेम का तात्पर्य केवल भावनात्मक संतोष नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों की साझेदारी भी है. पार्वती शिव से आग्रह करती हैं, परंतु शिव तर्क के माध्यम से उन्हें समझाते हैं कि उनकी एक क्रिया से पूरे ब्रह्मांड में हलचल मच सकती है. यह पुरुष की शक्ति को नहीं, बल्कि उसके विवेक और उत्तरदायित्व को दर्शाता है. शिव अंततः पार्वती के आग्रह को स्वीकारते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि प्रेम और सम्मान के समन्वय से जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान संभव है.
प्राकृतिक तत्वों की भूमिका
शिव के नृत्य से उत्पन्न होने वाले संभावित संकट केवल प्रतीकात्मक नहीं हैं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि ब्रह्मांड की हर छोटी-बड़ी क्रिया का प्रभाव व्यापक होता है. उदाहरण स्वरूप:
• अमृत बूंदों से बाघंबर जीवित होकर नंदी को खा सकता है– यह शक्ति के असंतुलन का प्रतीक है, जहां एक तत्व दूसरे को नष्ट कर सकता है.
• गंगा का प्रवाह अनियंत्रित हो सकता है– यह दर्शाता है कि जब कोई शक्ति अपने नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो वह विनाशकारी हो सकती है.
• सर्पों का गिरना और मयूरों द्वारा मारा जाना– यह विरोधाभासी तत्वों के बीच संघर्ष को इंगित करता है.
• मुंडमाल के गिरने से प्रेतों का जाग उठना– यह दर्शाता है कि यदि संतुलन बिगड़ता है, तो मृत (अव्यवस्थित) चीजें भी पुनः क्रियाशील हो सकती हैं.
इन सभी तत्वों के माध्यम से विद्यापति यह दिखाते हैं कि शिव केवल एक सर्वशक्तिमान देवता नहीं हैं, बल्कि वे सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने वाले शक्ति-स्रोत भी हैं.
नारी शक्ति और दांपत्य जीवन में स्त्री की भूमिका
विद्यापति की इस कविता में पार्वती केवल शिव की सहधर्मिणी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र इच्छाशक्ति वाली स्त्री हैं. वे केवल आदेश का पालन करने वाली देवी नहीं, बल्कि वे शिव से एक अनुरोध करती हैं और अपनी इच्छा को प्रकट करती हैं. यह इस बात को दर्शाता है कि स्त्रियों की इच्छाओं का भी महत्व है और पति को उन्हें स्वीकारना चाहिए. अंत में, शिव अपनी नृत्य-लीला को संभालते हुए पार्वती की इच्छा का सम्मान करते हैं. यह एक आदर्श दांपत्य का प्रतीक है, जहां पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हैं.
आधुनिक संदर्भ में संदेश
आज के संदर्भ में इस कविता की प्रासंगिकता कई स्तरों पर दिखती है.
• स्त्री सशक्तिकरण– यह कविता दर्शाती है कि स्त्री केवल पुरुष की परछाईं नहीं, बल्कि स्वयं एक सशक्त और स्वतंत्र अस्तित्व है. पार्वती का आग्रह यह संकेत देता