इस बार गणतंत्र दिवस पर

– लतीफ़ घोंघी

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‘आप चुप हैं. गणतंत्र दिवस पर आप चुप रहें तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’

‘क्या बोलें? समझ लो कि अपनी बोलती बंद है. स्कूल में देशभक्त लोग गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. बच्चे परेशान कर रहे हैं- नया ड्रेस सिलवा दो, सफ़ेद जूते खरीद दो, लाल मोज़े ले दो. तीन सौ रुपय की सीढ़ी चपत पड़ गई इस गणतंत्र पर.’

‘आज़ादी मिली है तो तीन सौ से नहीं डरना चाहिए आपको. साहबों और इंस्पेक्टरों को हज़ारों रुपया हंसते-खेलते खिला देते हो और बच्चों को नया ड्रेस सिलवा देने के नाम पर इतने उदास हो गए?’ 

वह चुप हो गए. अपनी दुकान पर रखे सेव-गांठिया के डिब्बों को देखने लगे. दिन भर मिक्चर की पुड़िया लपेटते हैं लोगों के लिए. दुकान पर नमकीन भंडार का इतना बड़ा बोर्ड लगवा रखा है कि बोर्ड देखकर ही सेल्स टैक्स वाला बोर्ड को बाद में, पहले उनको ही नीचे उतार दे. पिछले जनता शासन में उनका जलेबी भंडार था. उधर जनता शासन टूटा और इधर उनकी जलेबी टूट गई. सत्ता आने से जितने उदास जनता पार्टी वाले नहीं हुए थे उससे अधिक उदास वे ड्रेस सिलवाने के नाम पर आज हो रहे थे. उन्हें लग रहा था कि गणतंत्र दिवस पर किये जाने वाले इस फालतू ख़र्च को मेक-अप करने के लिए उन्हें कई किलो सेव-गांठिया तौलना पड़ जाएगा. उनके चेहरे पर फालतू खर्च की पीड़ा सरकारी सोयाबीन तेल में गर्म कड़ाही पर उभरते झाग की तरह उभर रही थी.

अचानक सेव-गांठिया से निकल कर वह बोले- ‘हम तो इन मास्टरों और बहनजियों के मारे परेशान हैं. पढ़ाई- लिखाई तो गई भाड़ में, ड्रेस-जूते पर सबका ध्यान केंद्रित हो गया है. आप ही बताइए कि बिना नए ड्रेस के क्या गणतंत्र दिवस नहीं मनाया जा सकता? जूते सफ़ेद होने चाहिए और मोज़े बिल्कुल लाल, आदमी के खून की तरह. दिन भर सेव-गांठिया बेच-बेच कर हमारा खून कितना लाल रह गया है यह सोचने की फ़िक्र किसी को नहीं है. तीन सौ रुपया कमाने के लिए हमें कितनी जोड़-तोड़ करनी पड़ती है, हम ही जानते हैं. बस, हुकुम जारी कर दिया- नया ड्रेस सिलवा कर लाओ,नए जूते लाओ, चारों तरफ लाओ-लाओ. मरे सेव-गांठिया वाला. ऐसा गणतंत्र भी किस काम का.’

मैंने कहा- ‘ कैसे नागरिक हैं आप? गणतंत्र दिवस पर आपको ख़ुशी नहीं होती?’

वह बोले- ‘होती है भइया, बहुत होती है. देख रहे हो ख़ुशी के मारे हमारा वज़न सात किलो काम हो गया है. पिछले गणतंत्र पर पैंसठ किलो था. इस बार रेलवे प्लेटफार्म की मशीन के कथनानुसार हम अट्ठावन किलो के हो गए हैं- जूते-कपड़े का वज़न जोड़कर. सात किलो सूख गए एक साल में.’

‘यानी कि आप हर गणतंत्र दिवस पर अपने आपको तौलते हैं?’

‘अरे भइया, तौलते क्या हैं, अपनी तसल्ली के लिए देख लेते हैं कि बदन पर इस व्यवस्था के लिए कितना मांस बाकी है. इस महंगाई और भ्रष्टाचार के मारे जितना बच जाए अच्छा है.’

मैंने व्यंग्य प्रसंग का छोर पकड़ लिया था. बातों का सिलसिला जारी रखते हुए मैंने कहा- ‘शरीर पर ज़्यादा मांस बचा कर क्या करोगे? जितना ज़्यादा मांस होगा, उतने ही चील-कौवे आपके पास मंडराएंगे.’

वह बोले- ‘एक साल में सात किलो मांस चील-कौवे नोच गए, इस पर भी आपको संतोष नहीं हुआ? मैं पूछता हूं कि क्या हम ही मिले हैं आपको इस बार गणतंत्र दिवस पर व्यंग्य के लिए? थोड़ा बहुत व्यंग्य तो हम भी समझते हैं, गुरु जगन्नाथ प्रसाद मिश्र के इलाके के हैं.’

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‘यानी कि चील-कौवे का अर्थ समझ गए आप?’

‘आपने हमें इतना मूर्ख समझ लिया है? चील-कौवों के बीच जी रहे हैं और मतलब नहीं समझेंगे क्या?’

‘समझ गए तो हमें बता दीजिये कि किस डिपार्टमेंट के हैं ये चील-कौवे?’

‘अरे साहब, सभी डिपार्टमेंट में भरे पड़े हैं. ये तो गिद्धों की बस्ती है. सरकार ने पाल रखे हैं हमारे लिए. अपनी दुकान का बड़ा बोर्ड देखकर कल एक सेल्सटैक्स ऑफिस का चील उड़ता हुआ आया और दुकान पर बैठ गया. देखने लगा हमारा बदन. हमने कहा- नोच लो दादा तुम भी दो-चार सौ ग्राम नोच लो, जब तक बदन में मांस है ले जाओ.’

‘ गणतंत्र दिवस पर इतने ऊंचे विचार आपके मन में कहां से आ रहे हैं?’

‘इस प्रजातंत्र में सात किलो वज़न कम हो जाने के बाद ऊंचे विचार नहीं आयेंगे तो क्या घटिया विचार आयेंगे? सच कहें तो हमारी आत्मा दुखी है यह देख कर और जब आत्मा दुखी होती है तो ऊंचे विचार ही आते हैं.’

‘ये आत्मा कहां से आ गई बीच में इस गणतंत्र दिवस पर?’

‘आदमी का वजन गिर जाने के बाद शरीर में आत्मा ही शेष रह जाती है.’

‘कैसी है आपकी आत्मा? आपकी आत्मा को दुखी होने के अलावा और कोई काम नहीं है? लालकिले पर फहराता झंडा देखकर भी आपकी आत्मा प्रसन्न नहीं होती?’

उन्होंने आज के अखबार को फाड़कर चार टुकड़े किये और एक ग्राहक के लिए ढाई सौ ग्राम सेव-गांठिया तौलते हुए कहा-‘ चालीस रुपय किलो का तेल खाने के बाद आत्मा दुखी ही होगी. दुखी लोगों की आत्मा को कितना भी खंगालो उसके अंदर से केवल दुःख ही निकलेगा.’

‘यानी कि आप आदमी नहीं एक दुखी आत्मा हैं?’

‘हां भइया, वही समझ लो. तुम्हारे पेट में कुछ दर्द हो तो साफ़-साफ़ बताओ. दो-चार सौ ग्राम तुम भी नोच लो इस बदन से. तुम्हें भी क्यों पछतावा रहे कि तुम नहीं नोच पाए. प्रजातंत्र को समर्पित यह माटी का चोला तुम्हारे कुछ काम आ गया तो हम अपने आपको धन्य समझेंगे.’

‘बड़ी नपी-तुली बातें कर रहे हैं आप इस बार गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर.’

‘वह इसलिए कि कल ही दुकान पर नाप-तौल वाले साहब आये थे. कहने लगे कि हम नकली बांट रखते हैं, कांटा मारते हैं, ग्राहकों का शोषण करते हैं. आप ही बताइये कि एक पाव गांठिये से हम कितना शोषण कर लेंगे? जहां लाखों रुपयों का शोषण हो रहा है वहां कोई नाप-तौल वाला नहीं है. ढाई सौ ग्राम सेव-गांठिए वाले के पीछे सरकार पड़ी है. कहने लगे कि वे हमारा चालान करेंगे.’

‘क्या खा फिर आपने?’

‘हमने कहा कि पूरे बांट देख लो. एक-एक तौल ले लो. थोड़ा भी फर्क हो तो चालान कर देना. हमारी बात सुनकर वे मुस्कुराये. बोले, सरकारी नौकरी कर रहे हैं तो फर्क निकालना हम जानते हैं.’

‘यानी कि नाप-तौल के चक्कर में आपका चालान हो ही गया?’

‘नहीं हुआ चालान. इस व्यवस्था में जब तक आदमी के बदन पर मांस है, चालान नहीं हो सकता, यह हम जानते हैं. साढ़े तीन सौ ग्राम वे भी ले गए. हमने कहा, ले जाओ साहब, जब सारे लोग ले जा रहे हैं तो नाप-तौल वालों ने क्या बिगाड़ा है?’

‘मतलब यही हुआ कि आप बेईमान सिद्ध हो गए.’

‘बिलकुल सिद्ध हो गए भइया. ईमानदारी का ठेका तो चील-कौवों ने ले रखा है. सही काम कर रहे हैं फिर भी नुचवा रहे हैं अपने आप को. इसीलिए हम कहते हैं कि हमारी आत्मा दुखी है.’

मैंने कहा- ‘फिर इस गणतंत्र दिवस पर बच्चों का क्या होगा? नया ड्रेस सिलेगा या नहीं? सफ़ेद जूते आएंगे या नहीं? लाल मोज़े उन्हें मिलेंगे या नहीं?’

वे चुप हो गए. बहुत देर तक सेव-गांठिये वाले डिब्बों को देखते रहे. इस प्रसंग को आगे बढ़ने की मेरी हिम्मत भी नहीं रही.

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