शरद कोकास

मकर संक्रांति के आगमन से एक सप्ताह पूर्व यह प्रश्न हमारे घर की संसद में उठाया जाने लगता- इस बार ‘वान’ में क्या देंगे या क्या देना है? आप लोगों के लिए ‘वान’ यह शब्द नया होगा इस शब्द तक पहुंचने के लिए इसकी पृष्ठभूमि बताना आवश्यक होगा.
मकर संक्रांति पर्व के विषय में हम सब जानते हैं. यही एकमात्र ऐसा पर्व है जिसे सौर कैलेण्डर के आधार पर मनाया जाता है, बाकी सारे तीज त्यौहार होली, दिवाली, ईद आदि मनाने का क्रेडिट तो चांद के हिस्से में आ जाता है.
सूर्य एक अच्छा बॉस है. समय पर अपने दफ्तर में आता है और समय से जाता है. पूरे तीन सौ पैंसठ दिनों तक एक जैसा क्रम. हां यह जरुर होता है कि सर्दी के दिनों में वह थोड़ा शॉर्टकट वाले रास्ते से आता है और गर्मी के दिनों में थोड़ा लंबा रास्ता अख्तियार करता है यानि सर्दियों में दक्षिण की ओर वाला रास्ता और गर्मियों में उत्तर की ओर वाला रास्ता. मकर संक्रांति का दिन उसके रास्ता बदलने वाला दिन होता है, पंडितों की भाषा में कहें तो दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का दिन.
सूर्य के आने- जाने का रूपक सदियों से चला आ रहा है लेकिन हम सब जानते हैं कि सूर्य न कहीं आता है न जाता है, पृथ्वी ही दीवानी की तरह उसके इर्द- गिर्द घूमती रहती है और अंडाकार या दीर्घ वृत्ताकार पथ में होने के कारण कभी दूर चली जाती है तो कभी पास आ जाती है गोया कि छह माह उत्तर की ओर झुकते हुए चलती है और छह माह दक्षिण की ओर. इस तरह सूरज के राह बदलने के रूपक में कहें तो यहां रास्ता ही अपना रास्ता बदल लेता है.
प्रकृति के हर परिवर्तन को उत्सव के रूप में संपन्न करने वाले हमारे देश में यह दिन मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है. ग्रेगोरियन कैलेण्डर के अनुसार प्रत्येक वर्ष की चौदह जनवरी को आनेवाली यह तिथि अपने धर्म के कैलेण्डर के अनुसार नववर्ष का उद्घोष करने वालों के प्रकोप से अब तक बची हुई है. यद्यपि चांद की भांति सूर्य भी विश्व की अनेक सभ्यताओं में एक देवता है और यह दिन उसके धनु राशि से मकर राशि में आने का दिन माना गया है इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं.
चूंकि सूर्य तो देश के सभी प्रांतों में निकलता है इसलिए देश के अलग- अलग प्रांतों में इस दिन को अलग- अलग नाम से जाना जाता है. सामान्यतः इसे संक्रांति या मकर संक्रांति कहते हैं, तमिलनाडु में यह पोंगल कहलाता है. हमारी दादी मां दो ऋतुओं के इस मिलन पर्व को उत्तर प्रदेश की शब्दावली में खिचड़ाई कहती थी. इस दिन घर में खिचड़ी पकना अनिवार्य था.
मां झांसी से आई थी और उन्हें पता नहीं था कि महाराष्ट्र में इस दिन हल्दी- कुंकुम की परम्परा है. पहले दूसरे साल तो उन्हें समझ में नहीं आया कि पड़ोस की औरतें उनसे क्यों कहतीं हैं “कोकास बाई, आज आमच्या घरी हल्दी कुंकु साठी या.” अर्थात कोकास बाई आज हमारे घर हल्दी कुमकुम के लिए आइये. मां यू पी की थीं, जब उन्होंने अपने नाम के साथ बाई सुना तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ. बाद में पता चला कि महाराष्ट्र में बाई शब्द बहुत सम्मान सूचक है. हमारे पड़ोस में बाद में एक स्कूल भी खुला उसका नाम था ‘इंदिरा बाई गांधी प्राथमिक शाला.’ हल्दी कुमकुम के लिए पहली बार जब वे पड़ोस में गईं तो उनके यहां से उपहार में बेर, तिल्ली के लड्डू, कच्चे चावल के साथ स्टील का एक चम्मच लेकर आईं, उन्होंने बताया कि यह ‘वान’ है.
ऐसा कहते हैं कि वान की परम्परा महाराष्ट्र में पेशवाओं के समय से चली आ रही है. उन दिनों जब घर के पुरुष युद्ध के लिए निकलते तो महीनों घर नहीं लौटते थे. राज्य की ओर से प्राप्त सहायता से उनका घर खर्च तो चल जाता था लेकिन वे अपना अकेलापन कैसे दूर करें, अतः उन्होंने हल्दी- कुमकुम के बहाने मेल- मिलाप का यह तरीका ढूंढ निकाला. महिलाऐं एक दूसरे के घर जातीं, आपस में हल्दी कुमकुम लगातीं और एक दूसरे के सुहाग की कामना करतीं. हल्दी- कुमकुम के अलावा दिन के तिल- तिल बढ़ते जाने के प्रतीक के रूप में वे तिल, मौसम के बेर, फल, फल्लियां और अनाज भी एक दूसरे को देतीं थीं, साथ ही उपहार के रूप में घर में काम आने वाली कोई वस्तु, या वस्त्र भी प्रदान करतीं. यही उपहार ‘वान’ कहलाया.
जैसे- जैसे समय बदलता गया वान की वस्तुऐं भी बदलती गईं पहले वान में सुहाग से जुडी चीज़ें जैसे काजल, कुमकुम की डिब्बी, चूड़ियां आदि दी जाती थीं फिर स्टील के चम्मच, कटोरियां, प्लास्टिक के डिब्बे डिब्बियां दी जाने लगीं.
माह भर चलने वाला हल्दी कुमकुम यह कार्यक्रम इस तरह आयोजित किया जाता कि प्रतिदिन तीन या चार महिलाओं के घर में यह कार्यक्रम होता. बुलौव्वा देने की ज़िम्मेदारी बच्चों पर सौंप दी जाती “आज हमारे घर सायं चार बजे से हल्दी- कुमकुम का कार्यक्रम है, आप सादर आमंत्रित हैं, इस आशय का एक सूचना पत्र अर्थात एक कागज़ लेकर हम बच्चे निकलते और कागज़ में दी गई लिस्ट के अनुसार घर घर जाकर आंटियों से साइन करवाकर लाते और मां को सौंप देते.
इस तरह महिलाओं की संख्या के अनुसार आयोजन की व्यवस्था की जाती. हम बच्चे हरकारे का यह काम ख़ुशी- ख़ुशी करते थे. घर से मिलने वाले पारिश्रमिक के अलावा आंटियों के घर से मिलने वाले टॉफ़ी बिस्किट का मोह तो होता ही था. जिस आंटी के घर से कुछ नहीं मिलता उन्हें हम ब्लैक लिस्ट में डाल देते और अगली बार उनके घर जाने से कन्नी काट लेते.
घर के पुरुष अक्सर इस आयोजन के समय अपना टाइम पास मोहल्ले के नुक्कड़ पर या बाज़ार में करते. बाबूजी कार्यक्रम शुरू होने से पूर्व तक इस काम में मां का बराबर सहयोग करते थे, जैसे बाज़ार से वान की वस्तु लाना, बेर, पोपट की फल्ली, अनाज, तिल आदि लाना. बाबूजी हर बार कुछ इनोवेटिव वस्तुऐं वान के लिए लाते जैसे एक बार वे सबको देने के लिए पंद्रह पैसे वाला पोस्टकार्ड लेकर आये थे.
जाने कितने वर्ष बीत चुके लेकिन महाराष्ट्र में वान की यह परम्परा जारी है बल्कि अब गोवा, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान में भी यह पर्व प्रारंभ हो चुका है. बच्चों का हरकारे वाला काम अब व्हाट्स एप कर देता है वान की वस्तुऐं भी बदलती जा रही हैं उसमे पौधों के गमले, चाबी के गुच्छे, परफ्यूम, लिपिस्टिक जैसी चीजें शामिल हो गई हैं. यू ट्यूब पर बाकायदा वीडियो अपलोड किये जाते हैं कि इस साल और क्या क्या नई वस्तुऐं दे सकते हैं. संभवतः अमेजोन फ्लिप्कार्ट जैसे ऑनलाइन शॉपिंग वालों ने भी अब इस तरह की योजनाऐं शुरू कर दी हैं. बाज़ार हर भावना को इनकैश करना जानता है.
यदि आपके घर में हल्दी कुमकुम का आयोजन हो तो ‘वान’ में आप क्या देना पसंद करेंगे?