– भूपेंद्र बिष्ट
ज्योतिष शास्त्र 12 राशियों में मेष, कर्क, तुला तथा मकर को ज्यादा अहम आंकता है. इन्हीं राशियों के नाम पर तिथियों की संक्रांतियां भी हैं और सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है, तदनुसार ही संक्रांति जानी जाती है. पौष माह में सूर्य देव जैसे ही शीत के कफस की जड़ता को तोड़ मकर राशि में आते हैं तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है. सूर्योपासना का सबसे बड़ा पर्व. नदियों के किनारे कल्पवास के उपक्रम का मौका और स्नान – दान का पुनीत अवसर.
खिचड़ी का यह विशेष दिवस उत्तराखंड में ‘उत्तरैणिक कौथिक” का दिन है. आटे व गुड़ से बनाए जाने वाले “घुघूती” कौवों को बुलाकर खिलाने का दिन.

काले कौवा काले
घु घू ती माला खाले.
कहा जाता है कुमाऊं के चंद वंशीय निसंतान राजा कल्याणचंद को भगवान बागनाथ की कृपा से पुत्र की प्राप्ति हुई तो बालक का नाम घुघूती रक्खा गया, जिसकी कौवे से अतिशय प्रीति हो गई. एक दूसरी जनश्रुति में कहा गया है कि भाई जब धुर पहाड़ में ब्याही अपनी बहन से मिलने आता है तो वह निद्रावस्था में होती है, भाई उसे जगाए बिना घर से लाए हुए पकवान की सामग्री छोड़ कर लौट जाता है. बाद में बहन रुआंसी होकर अपना विलाप एक कौवे को बताती है.

कुमाऊं के अंचल में मकर संक्रांति का सर्वाधिक ख्यात और श्रद्धा पर अवलंबित, लोकप्रिय मेला हल्द्वानी – नैनीताल मार्ग पर रानीबाग में जियारानी का मेला नाम से लगता है. जियारानी हैं खैरागढ़ के कत्यूर सम्राट प्रीतम देव ( 1380-1400 ) की महारानी, ब्रह्मदेव ( 1400-424 ) की मां और लोककथा नायक
मालूशाही ( 1424-1440 ) की दादी. ऐतिहासिक वृतान्तों के अनुसार उत्तरी भारत के गंगा जमुना रामगंगा के दोआब में जब तुर्कों ने डेरा जमा लिया तो ये रूहेले राज्य विस्तार के इरादे से पहाड़ की गौला नदी के किनारे किनारे बढ़ने लगे. इनका रास्ता रानी जिया ने बड़ी वीरता से रोका, वे पराजित भी हुए और भाग खड़े हुए.
एक अलसुबह स्नानरत जिया रानी पर रुहेलों ने प्रतिघात कर दिया और रानी शहीद हो गई. उसके बाद दुश्मनों ने पत्थर पर फैला रानी जिया का हीरे मोती जड़ा लहंगा उठा ले जाना चाहा तो बताते हैं, वह भी पत्थर का बन गया. आज भी लोग उस शिला को देखने रानीबाग आते हैं. कत्यूर पहाड़ी और आसपास के गांव के वंशानुगत जगरिये ढोल, दमुओं के साथ संक्रांति की पूर्व रात भर जागर एवं बैर गाते हैं और पार्श्व में लोगों का समवेत स्वर गूंजता सुनाई देता है- जै जिया, जय हो जिया.
फिर अगली सुबह, फिजाओं में लोकगायक नरेंद्र नेगी का गाना- “घुघुति घुरोण लागी म्यार मैतेकी” या गोपाल बाबू गोस्वामी का गीत- “आम की डाई मा घुघुति नी बासा” और कौतिक शाम तक बदस्तूर जारी.
उसके बाद, कहना न होगा कि कालिदास ने “ऋतुसंहार” में पकी हुई धान की बालियों का जो मोहक व रूपहला दृश्य प्रणीत किया है, मकर संक्रांति से वसंत तक खेतों में गेहूं की सुकोमल मगर हरेपन से लबालब पौंध भी उससे कमतर नहीं. इसीलिए संक्रांति की अभिधा चाहे यात्रा हो पर लक्षणा संबंधों में ऊष्मा लाने का आव्हान है.