– प्रीता व्यास
एक वक़्त था जब लोग बिना ज़रुरत बाज़ार नहीं जाते थे. मुझे याद है मेरी दादीमां महीने में केवल एक बार सौदा लेने बाजार जाती थीं और वो भी ज़रूरी सामानों की लिस्ट बना कर, सब्ज़ी- भाजी घर में साप्ताहिक रूप से आती थी और कपडे-लत्ते सिर्फ तीज-त्यौहार पर. हम वैसे नहीं हैं. एक चीज़ की ज़रुरत होती है तो झट गाड़ी उठा कर भागते हैं और चार और चीज़ों के साथ लौटते हैं. ज़्यादातर लोगों का यही हाल है.
वक़्त के साथ बाज़ार का स्वरुप बदला है, पूरी अवधारणा ही नई हो गई है. उपभोक्ता का मिजाज भी बदला है. कुछ नहीं तो लोग ‘विंडो शॉपिंग’ के लिए चले जाते हैं. कुछ खाया-पिया, कुछ छोटा- मोटा गैरज़रूरी खरीद भी लिया. कुछ को सेल ललचाती है तो कुछ को ऑनलाइन शॉपिंग में मज़ा आता है. घंटों सर्फ़ करते रहते हैं सामानों को और रोज़ ही कुछ न कुछ ऑर्डर कर देते हैं. कुछ दुकानें बड़ी खरीदी पर इंट्रेस्ट फ्री शॉपिंग का प्रलोभन देतीं हैं. कहीं एक ख़रीद पर एक मुफ़्त का वादा है तो कहीं लकी ड्रॉ में सोने-चांदी के सिक्के से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान देने की बात.
ऐसा अक्सर होता है कि आपको कुछ नहीं ख़रीदना होता लेकिन आपके मित्र कहते हैं-” अरे चलो ना, क्लीयरेंस सेल लगी है, कुछ आइटम पर तो एक के साथ एक फ़्री भी है.’ और आप चल देते हैं. जाते इस पक्के इरादे के साथ हैं कि मुझे नहीं खरीदना है, मैं बस साथ जा रही/ रहा हूं लेकिन जब लौटते हैं तो आपके हाथ में भी थैले होते हैं.
हम में से अक्सर लोग ऐसा ही करते हैं. जब कहीं किसी दुकान या ब्रैंड पर सेल का बोर्ड देखते हैं तो ख़ुद को खरीदारी करने से रोक ही नहीं पाते. ऐसा लगता है जैसे हम दुकानदार को बेवक़ूफ़ बनाकर कम दाम में ज़्यादा सामान ख़रीद कर ला रहे हैं. मन ही मन एक अलग तरह की जीत का एहसास होता है. “बड़ी अच्छी डील मिल गई”, कुछ ऐसा कहते हैं बड़ी शान से.
न्यूरोमार्किटिंग के कुछ जानकारों का कहना है कि जब भी हम कहीं सेल का बोर्ड लगा देखते हैं तो हमारे ज़हन में एक ख़ास तरह का ज़ज़्बा पैदा हो जाता है. हमारे दिमाग़ में कुछ ख़ास तरह की तरंगें पैदा होती हैं, जो दिमाग़ को ख़रीदारी करने का आदेश देने लगती हैं. ऐसे में हम ये फ़ैसला सोच समझ कर नहीं करते कि हमें क्या ख़रीदना है और क्या नहीं. हमें उस चीज़ की ज़रूरत है भी या नहीं. बहुत मर्तबा हम यही सोच कर ख़रीदारी कर लेते हैं कि चलो अभी ख़रीद लेते हैं, जब वक़्त आएगा तब इस्तमाल कर लेंगे. या किसी को तोहफ़े में ही दे देंगे.
हालांकि कुछ लोग आज भी हैं जो इस अति-उत्पादन के युग में प्रलोभनों से बचते हुए कम उपभोग करना चाहते हैं और अपने घर को साफ-सुथरा रखना चाहते हैं लेकिन कुछ अन्य लोगों को लगता है कि उनकी खरीदारी एक समस्या बनती जा रही है. अक्सर ये लोग बेइरादा घर से निकलते हैं और गैरज़रूरी सामानों के थैले उठाये वापस लौटते हैं.
एक शोध समीक्षा से पता चलता है कि खरीदारी की लत दुनिया की लगभग 5 फीसदी आबादी को प्रभावित कर रही है. हालांकि इस लत की गंभीरता अलग-अलग लोगों में अलग-अलग स्तर की हो सकती है. विशेषज्ञों को लगता है कि यह समस्या बढ़ रही है और इसके उपचार के लिए बेहतर साधनों की जरूरत है.
मेरी एक 34 वर्षीय मित्र है जो स्ट्रेस काम करने के लिए शॉपिंग पर चली जाती है. दरअसल स्ट्रेस से परेशान लोग खरीदारी करते समय एक तरह के नशे में होते हैं, लगभग उसी तरह जैसा कुछ ड्रग्स लेने वाले लोगों का अनुभव होता है. स्ट्रेस्ड लोग जैसे ही ख़रीदारी का फ़ैसला करते हैं उनके अंदर पॉज़िटिव एनर्जी का संचार हो जाता है. न्यूयॉर्क की मनोवैज्ञानिक जॉर्डना जैकब्स कहती हैं, “जब हम खरीदारी करते हैं तो हमें डोपामाइन (मस्तिष्क के न्यूरॉन्स से निकलने वाला रसायन) का एक हिट मिलता है. इससे कुछ समय के लिए हमारा मूड अच्छा हो जाता है.”
सिर्फ मेरी मित्र ही नहीं बहुत सारे लोग दुख, तकलीफ से ध्यान हटाने के लिए खरीदारी का सहारा लेते हैं. लेकिन इस तरह की गैर ज़रूरी खरीददारी से ना सिर्फ समय और पैसों की बर्बादी होती है बल्कि घर में भी कचरा इकट्ठा होता जाता है. मैं एक ऐसी महिला को जानती हूं जिसे खुद याद नहीं कि उसके पास कितने कपडे हैं, क्या-क्या है और वो लगातार फिर भी खरीदे जाती है. अब ऐसे लोग भी इस खरीददारी की बीमारी से निजात चाहते हैं.
न्यूरो मार्केटिंग रिसर्चर डैरेन ब्रिजर का कहना है कि शॉपिंग करना किसी ख़ज़ाने की तलाश करने जैसा ही होता है. जब आप किसी शो रूम में जाते हैं या किसी शॉपिंग साइट पर जाते हैं, तो, बहुत सी चीज़ें नज़र आती हैं. आप हरेक चीज़ को बड़े चाव से देखते हैं. आपकी नज़र उस ख़ास चीज़ को तलाशती रहती है जो देखते ही पहली नज़र में पसंद आ जाए, जो बिल्कुल अलग हो. उस चीज़ की मौजूदगी आपको अलग पहचान दिलाए, दस लोग आपसे पूछें कि बहुत अच्छा है, कहां से लिया. और जब वो मन चाही चीज़ आपको मिल जाती है तो मानो मन की मुराद पूरी हो जाती है. उस ख़ाज चीज़ की तलाश आपको खुशी का एहसास कराती रहती है. रिसर्चर इस एहसास को इमोशनल एंगेजमेंट कहते हैं. उनके मुताबिक़ जैसे ही आपको आपकी पसंद की चीज़ मिल जाती है आपके दिमाग़ में ख़ास तरह की तरंगे पैदा होती है जो दिमाग़ को ख़रीदारी करने का आदेश देती हैं.
जब आप शॉपिंग के लिए निकलते हैं तो सोचतें हैं चलो लगे हाथ अपने पसंद के ब्रांड वाली दूकान का भी एक चक्कर लगा ही लेते हैं. हो सकता है कोई काम की चीज़ मिल जाए. इसी तरह अगर किसी चीज़ के लिए आपकी दीवानगी है. और जब आप बाज़ार जाते हैं तो पहले से ही तय होता है कि फलां चीज़ तो लेनी है. मिसाल के लिए आपको जूतों का शौक़ है तो जब भी आप शॉपिंग के लिए जाते हैं तो कोशिश रहती है कि कोई अच्छा जूता आपको नज़र आए तो ज़रूर ख़रीद लेंगे.
हम में से अक्सर लोग ख़रीदारी करने के शौक़ीन नहीं होते. लेकिन जिस तरह बाज़ार में चीज़ें हमें लुभाती हैं वो हमें एक तरह से ख़रीदारी करने का आदी बना देती हैं. हफ़्तेवार बाज़ार लगने का चलन सारी दुनिया में है. और बहुत से लोग हर हफ़्ते इस जज़्बाती उठा-पटक के दौर से गुज़रते हैं कि उन्हें बाज़ार जाकर ख़रीदारी करनी है.
कुछ रिसर्चर तो ये भी मानते हैं कि बहुत बार हम अपने अंदर की कलह को शांत करने के लिए भी शॉपिंग करते हैं. कुछ परेशानियां ऐसी आ जाती हैं, जब कुछ समझ नहीं आता कि क्या किया जाए. ऐसे में बहुत से लोग ख़रीदारी करके अपने दिमाग़ को उस परेशानी से कुछ वक़्त के लिए दूर कर लते हैं.
इंटरनेट पर कुछ चीज़ों के रिव्यू पढ़ने के बाद भी ऐसा होता है कि हम उस चीज़ को ख़रीद लेते हैं. या बहुत बार हमारे दोस्त ही हमें ऐसा करने के लिए मजबूर कर देते हैं. दरअसल वो अपनी बातों से आपको भी ललचा देते हैं. डिजिटल दुकान की बड़ी हो रही सामानों की सूची और भी लुभाती है जब ये छूट और दूसरे आकर्षक प्रस्तावों के साथ पेश की जाती हैं. त्यौहारों का मौसम आने पर तो ये कोशिश और भी तेज़ हो जाती है. यहां ये भी अहम है कि इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की गिनती 50 करोड़ तक पहुंच गई है और अगले तीन सालों में ये संख्या 82 करोड़ से भी ज़्यादा हो जाएगी, यानी डिजिटल दुकान के लिए ज़्यादा से ज़्यादा संभावित ग्राहक.
बाज़ारवाद से उपजी इस बीमारी पर वित्तीय विषयों की लेखक मिशेल मैक्ग्रा ने साल 2017 में “दि नो स्पेंड ईयर” नामक किताब लिखी.अगर आप गूगल, यूट्यूब और रेडिट पर “नो-बाय ईयर” या “नो-स्पेंड चैलेंज” तलाशें तो ढेरों परिणाम मिलते हैं. यूट्यूब के ब्यूटी चैनलों पर “नो-बाय” आम शब्द है. वहां “नो-बाय मंथ” या “लिपस्टिक नो-बाय” जैसी चीजें खूब दिखती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि एक साल तक खरीदारी नहीं करने से मानसिक सेहत सुधरती है.
सैन फ्रांसिस्को की कंज्यूमर साइकोलॉजिस्ट किट यैरो कहती हैं, “पिछले करीब 20 साल से हम सस्ते माल से भर गए हैं. लोगों के पास सामान रखने के लिए जगह कम पड़ रही है.” इस बात से वे हैरान नहीं होतीं कि लोग “नो-बाय” में भी खरीदारी कर रहे हैं.
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया की 26 साल की लेखिका और ब्लॉगर एम्मा नॉरिस 2019 को नो-बाय ईयर बनाने का प्रयास कर रही हैं. वह बोरियत और अकेलेपन से बचने के लिए ढेर सारे कपड़े खरीदती थीं. खरीदारी बंद करने का फ़ैसला करने से पहले नॉरिस ने अपनी अलमारियों की छंटाई की. इससे उनको पता चला कि उनके पास कितने कपड़े हैं और अब और कपड़ों की जरूरत नहीं है. कुछ जरूरी चीजें खरीदने के अलावा अब शॉपिंग करने की उनकी कोई योजना नहीं है. नॉरिस को उम्मीद है कि इससे उनके पास ज़्यादा समय होगा और वह अपने पार्टनर के साथ बाली और दूसरे देश घूम सकेंगी.
अगर आप बेवजह की ख़रीदारी से बचना चाहते हैं तो सबसे पहला काम ये कीजिए कि बिना वजह बाजार जाने से बचिए. बिल्कुल ऐसे ही जैसे अगर आप शराब नहीं पीते हैं तो शराबखाने में जाने से बचते हैं. ऑनलाइन अगर ख़रीदारी करते हैं तो सेल वाले खाने में सबसे बाद में जाइए. ऑनलाइन आप उन्हीं चीज़ों को तलाशें जिनकी आपको ज़रूरत है. अगर किसी चीज़ की बहुत ज़रूरत है तो उसी चीज़ को अपनी लिस्ट में सबसे पहले रखें. अगर कोई चीज़ ख़रीदने की फ़ौरन चाहत हो भी रही है तो उसे फ़िलहाल टाल दें. दूसरे किसी मौक़े पर ख़रीदारी करें ताकि बेवजह पैसा ख़र्च करने से आप खुद को बचा सकें.
ख़रीदारी जब भी करें अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ करें. दिमाग़ बहुत बार आपको पैसे ख़र्च करने के लिए कहेगा. लेकिन आपको अपने दिल और दिमाग़ को यही समझाना है जब ज़रूरत होगी तब ख़रीद लेंगे.