ग़ज़ल

प्रवीन राय

(1)

थक चुके हैं यहां पे चल-चल के.

अब तो मेहमां हैं एक दो पल के.

जाने क्या बात तुम में ऐसी है

देखते हैं जो आंख मल-मल के.

तेरे चेहरे की मुस्कुराहट ये

फूल जैसे खिले हों ‘सेमल’ के.

आंख कुछ इस तरह छलकती है

मय-क़दे में शराब ज्यूं छल के.

तुम से गुज़रे तो ये हुआ मालूम

जिस्म जैसे बने हों ‘संदल’ के.

तुम ने पहना है जब से पांवों में

भाव बढ़ने लगे हैं छागल के.

प्यास फिर प्यास रह गई कैसे

हम खड़े थे करीब ही जल के.

हम जो भटके हुए मुसाफ़िर हैं

ख़्वाब दिखलाइयो न मख़मल के.

(2)

मेरी हर बात हर सुख़न में है.

इश्क़ मेरे रहन-सहन में है.

‘मीर’ होते गले लगा लेते

ऐसा जादू मेरे कहन में है.

सर से पां तक खिली हुई हो यूं

चांद जैसे खिला गगन में है.

अब शराबों में वैसी बात कहां

जो नशा हां तेरे बदन में है.

क्या ग़ज़ब की मिठास लहजे में

क्या अदा चाल और चलन में है.

मन की बातें न पढ़ सकी तुम तो

क्या बताएं कि क्या ये मन में है.

(3)

ये देखो हाल हैं कैसे हमारे.

के हमसे हैं ख़फ़ा रस्ते हमारे.

ज़रा सी बात पर अनबन हुई और

ख़ुदा से हो गए झगड़े हमारे.

तुम्हारा क्या बिगड़ जाता अगर तुम

हमेशा के लिए होते हमारे.

कटेगी रात कैसे यह बताओ

के दिन गुजरेंगे अब कैसे हमारे.

ख़ुदारा ख़्वाब उस में बह रहे थे

जो आसूं आंख से छलके हमारे.

तरस खाओ अजी मासूमियत पर

हमे लौटा दो अब सपने हमारे.

(4)

धड़कनों में खिंचाव दरिया का.

इश्क़ क्या है ‘बहाव दरिया का’.

वस्ल जैसे चढ़ाव दरिया का

हिज्र जैसे कटाव दरिया का.

आंख जैसे चिनाब-झेलम हों

होंट जैसे घुमाव दरिया का.

उनका लहजा वो उनकी बातें सब

एकदम से सुभाव दरिया का.

डूब जाए न दिल हमारा अब

देख करके लगाव दरिया का.

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