– अजय अज्ञात
(1)
कल भी ये अधूरी थी, आज भी अधूरी है.
इश्क़ के बिना यारो, ज़िन्दगी अधूरी है.
जगमगा रहा है घर, जगमगाते बलबों से
ज़ेहन में अंधेरा है, रोशनी अधूरी है.
रहबरी नहीं करती, ज़ख़्म भी नहीं भरती
काम कुछ नहीं आती, शायरी अधूरी है.
आचरण नहीं बदला, सोच भी नहीं बदली
राम-राम जप कर भी, बंदगी अधूरी है.
आलीशान बंगला है, सुख के साजो-सामां हैं
काटती है तन्हाई, हर ख़ुशी अधूरी है.
(2)
ख़ुद ही को दरकिनार किये जा रहे हैं हम.
औरों पे ऐतबार किये जा रहे हैं हम.
क्या-क्या न खो दिया है,सुकूं की तलाश में
क्यूं दिल को बेक़रार किये जा रहे हैं हम?
होगी कृपा प्रभु की भला कैसे सोचिये!
जब पाप बेशुमार किये जा रहे हैं हम.
पर्दा पड़ा है अक़्ल पे, लालच के वश में क्यूं
दामन को दाग़दार किये जा रहे हैं हम.
क्यूं धर्म, जात-पात या मज़हब के नाम पर
इंसानियत पे वार किये जा रहे हैं हम.
(3)
वक़्त ने हर वक़्त ही, ज़ेरो-ज़बर जारी रखा.
फिर भी हर इक हाल में, हमने सफ़र जारी रखा.
चाहता था दिल तो रुक जाना, मगर जारी रखा,
आबले तलवों में ले कर, भी सफ़र जारी रखा.
मुझको कठपुतली बना कर, रक़्स करवाती रही,
ज़िंदगी ने इक तमाशा, उम्रभर जारी रखा.
ज़ालिमों के हौसले तो, और भी बढ़ जायेंगे,
हमने उनके ज़ुल्मों को, सहना अगर जारी रखा,
हादसों से आज तक भी, वो उबर पाया नहीं,
बदगुमानी की तबाही, ने असर जारी रखा.
यूं तो आवारा-मिज़ाजी में ज़रा हम कम न थे,
फिर भी हमने लौट आना अपने घर जारी रखा.
आज भी इन उंगलियों से, आती है ख़ुशबू तेरी,
जादुई-सी उस छुअन ने है असर जारी रखा.
प्यार के दो बोल सुन कर, दिल में ठंडक पड़ गयी,
इस ख़राशे-दिल पे मरहम, ने असर जारी रखा.
चाहे कितनी, कैसी भी, मसरूफ़ियत उस को रही,
शायरी करना ‘अजय’ ने, ख़ूबतर जारी रखा.
कैसे कहते हैं मुकम्मल शेर या उम्दा ग़ज़ल,
सीखना ‘अज्ञात’ ने इल्मो-हुनर जारी रखा.
(4)
मैं बंदगी के, बग़ैर ज़िन्दा, न रह सकूंगा.
कि शाइरी के, बग़ैर ज़िन्दा, न रह सकूंगा.
मुझे सुहाता, है रंग भरना, ही ज़िंदगी में
मुसव्वरी के, बग़ैर ज़िंदा, न रह सकूंगा.
नज़र इनायत, की डाल साक़ी, ज़रा इधर भी
मैं मैकशी के, बग़ैर ज़िंदा, न रह सकूंगा.
तुम्हीं से रौनक़, है ज़िंदगी में,ए ख़ैरख़्वाहो
मैं दोस्ती के, बग़ैर ज़िंदा, न रह सकूंगा.
उदासियों के, घने अंधेरे, हैं ज़िंदगी में
मैं रोशनी के, बग़ैर ज़िंदा, न रह सकूंगा.
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