– सोम नाथ गुप्ता “दीवाना रायकोटी”
(1)
हक़ीक़त से भला कौन मुंह मोड़ के जिया है.
ग़फ़लत में रहने वाला तो मर-मर के जिया है.
यारी को मज़हब के तराज़ू में क्यों तौला जाये,
मोहब्बत ने तो बराबर सबको हक़ हंस के दिया है.
सवाल है गहरा मगर सवाल पूछना तो पड़ेगा ही,
क्यों ज़िन्दगी हर पल इंसान घुट-घुट के जिया है.
बेशक गुलों ने ही चमन को चमन नाम दिया है,
मगर रवायतों ने हर सितम हिस्से फूल के दिया है.
लफ़्ज़ ही नहीं कभी खामोशी भी कसक बन जाये,
उसके लहजे ने दर्द मुझे जाम भर भर के दिया है.
यादों के झरोखे से लम्हे आज कुछ दाखिल हो गये,
रुक़’आ-ए-अलविदा उसने रुख़ से पर्दा उठा के दिया है.
रास्ते का ज़िक्र नहीं तो फिर मंज़िल की फ़िक्र कैसी,
ख़ुद जलाई न शमा इल्ज़ाम अंधेरों को दबा के दिया है.
टूट गये दिल के तार जब मुंह फेर गया ‘दीवाना’,
सहलाता था जो कभी उसी ने ग़म टूट के दिया है.
(2).
क़रीब थी मंज़िल मेरे मैं रास्ता खो बैठा.
लिखा जो कल रात मैं रूक़आ खो बैठा.
छू के कदम लहरें फिर समंदर हो गई,
तूफां का पता दे गईं मैं पता खो बैठा.
सुख की तलाश में दूर तलक निकल गया,
तिलस्मी दौड़ में चैन मैं सारा खो बैठा.
रफ़्ता-रफ्ता जलता रहा मैं आतिश-ए-इश्क में,
सनम मुस्कुराता रहा मैं सरापा खो बैठा.
रख के हाथ नब्ज पे बैठा रहा तबीब,
समझा ही नहीं वो मैं क्या-क्या खो बैठा.
ढूंढती रही तिश्नगी मेरी बूंद बाज़ारे ज़ुनून में,
बेवफ़ाई के दाम में ‘दीवाना’ मैं मयखाना खो बैठा.
(3).
क्यों मुझसे आजकल तू ख़फ़ा है.
तुझसे ही ज़िन्दगी का फ़ल्सफ़ा है.
तेरे फ़ैसले से कर लिया समझौता मैंने,
फिर क्यों समझता तू मुझे बेवफ़ा है.
बेफ़िक्री मेरी बयां करती है अंदाज़ मेरा,
मेरे दिल में नहीं मैल सब सफ़ा है.
इश्क में भरोसा नहीं तो कुछ भी नहीं,
दरिया-ए-शुबहा में डूब जाती वफ़ा है.
फ़ासले हमारे दरम्यान मिट भी सकते हैं,
‘दीवाना’ बदल दे जो बदले की दफ़ा है.
(4)
कुछ वक़्त ने मारा कुछ दिल से हारा.
कर नही पा रहा मैं यादों से किनारा.
जो अज़ीज़ थे वो दूर हो गये,
रह गया रिश्ता बस यादों से हमारा.
मेरे ही भरोसे में थी शायद कमी कोई,
जो छिन गया मेरा मुझ से सहारा.
ज़िन्दगी अब तुझसे राब्ता रखूं कैसे,
जो थे अपने कर गये मुझ से किनारा.
सींचता रहा पेड़ को माली बरसों,
फल ले गया कोई और पेड़ से सारा.
आबाद रहे आशियां मैं दुआयें करता रहा,
बिखर गया जो धक्का किसी ने जोर से मारा.
जो भूल गया तुम्हें उसे याद न कर,
शायद था न कभी वो दिल से तुम्हारा.
मेरे यक़ीं का दिया यह सिला उसने ‘दीवाना’,
डूबा गया गहरे पानी जिसे था भंवर से उभारा.