चार ग़ज़लें

– अतुल अजनबी

(1)

हवा सी, आग सी, पानी सी, धूप सी गुज़री.

हर इम्तिहां से यहां अपनी ज़िन्दगी गुज़री.

तमाम फूल उसी वक़्त टूट कर बिखरे

मेरे क़रीब से ख़ुशबू जब आपकी गुज़री.

हज़ार कोशिशें कर के भी हम न सो पाए

हरेक रात ही जैसी ये रात भी गुज़री.

मेरे ज़मीर की चट्टान को न काट सकी

हज़ार, दिल से तमन्नाओं की नदी गुज़री.

अंधेरी रातों में तेरे ख़यालो-नाम के साथ

न जाने कितने चिराग़ों की रौशनी गुज़री.

उन्हीं को दोस्त कहा जिन से दुश्मनी थी अतुल

कुछ ऐसे मोड़ से होकर ये ज़िंदगी गुज़री.

(2).

सफ़र में यूं तो बलाएं भी काम करती हैं

मगर किसी की दुआएं भी काम करती हैं.

किसी के रोने से मैं भी बिखरने लगता हूं

कि आंसुओं की सदाएं भी काम करती हैं.

चिराग़ हूं न कोई फूल हूं, यहां फिर भी

मेरे ख़िलाफ़ हवाएं भी काम करती हैं.

हमारा रोग बढ़ाने में अजनबी साहब

कभी कभी तो दवाएं भी काम करती हैं.

मुशायरों में फ़क़त शायरी नहीं चलती

मुशायरों में अदाएं भी काम करती हैं.

(3)

जलते बुझते रहे हैं सितारे मगर.

चांद रोशन है आकाश में बेख़बर.

क़ाफ़िले तेरी यादों के आते रहे

धूल सी नींद उड़ती रही रातभर.

धूप अना की जब आंगन से बाहर गई

किस क़दर है हरा ख़्वाहिशों का शजर.

इस तरह भी तो उलझन में है बाग़बां

कोई पंछी नहीं है किसी डाल पर.

उस मुसाफ़िर की उतरे थकन किस तरह

ख़्वाब में भी भटकता हो जो दरबदर.

(4)

जुमले यही सभी की ज़बां पर थे इस क़दर.

सच झूट उसके कैसे बराबर थे इस क़दर.

आंखें लहूलुहान हुईं देखने के बाद

दीवारे-दिल पे ज़ख्म के मंज़र थे इस क़दर.

दरिया की तरह मैं ने भी रस्ता बदल लिया

रस्ते में तंग ज़ेह्नों के पत्थर थे इस क़दर.

हम अपनी प्यास लेके नदी तक न जा सके

अतराफ़ में हमारे समन्दर थे इस क़दर.

कल चांदनी को चांद भी आया नहीं नज़र

जुगनू तमाम रात मुनव्वर थे इस क़दर.

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