जग को यह स्वीकार नहीं है

डॉ. निधि सिंह

प्रिय, मत भेजो मुझे संदेसे,

जग को यह स्वीकार नहीं है.

बीच भंवर से नाव प्रेम की,

तुम तारोगे यह माना था,

दुनियादारी से अनजानी 

मैंने कब सच  पहचाना था.

डूबेंगी  सारी  आशाएं हाथों में पतवार नहीं है.

प्रिय, मत भेजो मुझे संदेसे, जग को यह स्वीकार नहीं है.

अब आए हो तुम ख़ुद बनकर,

उन सारे प्रश्नों के उत्तर

जो विरहानल में अर्पित कर

दिए स्वयं मैंने उर भीतर ,

तुम पर क्या अधिकार जताऊं अब ख़ुद पर अधिकार नहीं है.

प्रिय, मत भेजो मुझे संदेसे, जग को यह स्वीकार नहीं है.

मनुज बंधा होता समाज के,

रीति नीति गत अनुबंधों में.

पहले से तय परिभाषाएं,

ही वह ढूंढ़े संबंधों में.

सारे रिश्ते उलझ रहे हैं इस दुविधा का पार नहीं है.

प्रिय, मत भेजो मुझे संदेसे, जग को यह स्वीकार नहीं है.

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