-प्रकाश उदय

निराला की असली पहचान उनकी अक्खड़ता और फक्कड़ता में है. बसंत पंचमी के दिन जन्मे इस महाकवि ने जीवन को भी उत्सव ही जाना. सरस्वती पुत्र निराला से लक्ष्मी सदा ही रूठी रही, लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह भी नहीं की. झंझावातों से घिरे जीवन को वे स्वयं ही गंगा किनारे ले आये. रोटी और लंगोटी के झमेलों से उन्होंने अपनी आत्मा को सदा मुक्त रखा.
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी कलम की प्रखरता से पारम्परिक विचारधाराओं के तिलिस्म को तोड़ा है. उनका नाम छायावाद के अलमबरदारों में बेशक शामिल है, लेकिन निराला को नई कविता के जनक के रूप में जानना अधिक श्रेयस्कर होगा. व्यवस्था के प्रति खुशामदी लहजे को सिरे से खारिज करते हुए गुलाब को प्रतीक बनाकर पूंजीवाद को ललकारने का माद्दा सिर्फ निराला में ही था.
कहीं झरने, कहीं छोटी-सी पहाड़ी,
कही सुथरा चमन, नकली कहीं झाड़ी.
आया मौसम, खिला फ़ारस का गुलाब,
बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब,
वहीं गंदे में उगा देता हुआ बुत्ता,
पहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-
“अबे, सुन बे गुलाब! भूल मत जो पायी खुशबू
रंग-ओ-आब, खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!
कितनों को तूने बनाया है गुलाम,
माली कर रक्खा, सहाया जाड़ा-घाम.
हाथ जिसके तू लगा,
पैर सर रखकर वो पीछे को भागा.
औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर,
तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर,
शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा
तभी साधारणों से तू रहा न्यारा.
वरना क्या तेरी हस्ती है, पोच तू
कांटो ही से भरा है यह सोच तू
कली जो चटकी अभी
सूखकर कांटा हुई होती कभी.
रोज पड़ता रहा पानी,
तू हरामी खानदानी.
सामाजिक असमानता का उथल-पुथल भरा वातावरण निराला की व्याकुलता को और भी बढ़ा देता था, समतामूलक समाज की स्थापना के लिए उनकी लेखनी ने कवि, लेखक, उपन्यासकार और संपादक की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई. इस मायने में निराला प्रगतिशील आंदोलन की रहनुमाई भी करते रहे. रोज़ी रोटी के लिए हाड़तोड़ मेहनत का दर्द उन्हें बेचैन करता था. ‘वह तोड़ती पत्थर’ इसी पीड़ा से उपजी उनकी मार्मिक कविता है.
वह तोड़ती पत्थर,
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर,
वह तोड़ती पत्थर.
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार,
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार,
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार.
चढ़ रही थी धूप,
गर्मियों के दिन
दिवा का तमतमाता रूप,
उठी झुलसाती हुई लू,
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गईं,
प्राय: हुई दुपहर,
वह तोड़ती पत्थर.
देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार,
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार
एक क्षण के बाद वह कांपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा
‘मैं तोड़ती पत्थर.’
निराला ने बचपन में अपनी मां को खोया, युवावस्था में पत्नी को और फिर अपनी इकलौती पुत्री को. इन कठोर आघातों को झेलने के बावजूद निराला का मन मोम सा बना रहा. किसी को भूखा देखते तो अपने हिस्से की रोटी भी उसे दे देते और किसी को ठिठुरता देखते तो तन के कपड़े भी उसे ओढ़ा देते. इसके बाद भी किसी से ना कोई गिला न शिकवा. स्वाभिमान ऐसा कि, मजाल है कोई उन्हें दया का पात्र बना सके. निराला ने अपनी फकीरी को ही अपना ओढ़ना और बिछोना बना लिया, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया. मानवता और परोपकार के लिए उनके हृदय के द्वार हमेशा खुले रहे. अपनी पुत्री सरोज की अकाल मृत्यु ने कविमन को गहरे अवसाद से भर दिया. एक पिता की पुत्री को अंतिम विदाई की कविता ‘सरोज स्मृति ‘ जीवन पर्यन्त निराला के साथ रही.
धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका.
जाना तो अर्थागमोपाय
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर.
और
मुझ भाग्यहीन की तू संबल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दु:ख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूं आज, जो नहीं कही.
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण.
निराला की आत्मा दुखों, पीड़ाओं और अपमान को सहते- सहते ‘महाप्राण’ में परिवर्तित हो गई. सामाजिक सरोकारों की पैरवी करते हुए इस महाप्राण ने कई तथाकथित मठाधीशों से जमकर लोहा लिया. अंततः नवजागरण का शंखनाद करते हुए निराला ने जीवन के अंतिम सत्य को गले से लगा लिया और अपने हिस्से के कालखंड को अमर कर दिया.
जागो फिर एक बार!
प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
अरुण-पंख तरुण-किरण
खड़ी खोलती है द्वार-
जागो फिर एक बार.
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