– डॉ. निधि सिंह

नव युग मंगल किरणों का सर्वत्र व्याप्त उजियारा.
शुभ ज्योति पर्व अभिनन्दन ज्योतिर्मय हो जग सारा.
जब कवच बने अनुशासन और शस्त्र बनें प्रतिभा – श्रम,
फिर निश्चित ही मिटता है घनघोर अशिवता का तम,
एक दीप हुआ प्राणों का रस फूंका जब माटी में
फिर तेल दिया सत चिंतन का स्नेहमयी बाती में
तब जाकर कहीं तमस को इस दीपक ने ललकारा.
अर्चन आराधन होते धर्मार्थ लाभ के साधन
पर स्वार्थ भरी भक्ति से पूरा कब होता पूजन
जग को प्रकाश दे दे कर क्या सूर्य तेज घटता है
आदर्शो का अनुशीलन जिस मनुज ह्रदय पलता है,
नित राग रंग रस निर्झर की बहती पावन धारा.
मरुथल में धार बनें हम ऐसा जागृत हो चिंतन,
निष्प्राण मनुजता जागे जुड़ते जाएं मन से मन,
जो व्याप्त विश्व के कण कण में ईश जान लेते हैं,
बन अग्रदूत जनहित विष भी अमिय मान लेते हैं,
कर वरण लोक मंगल पथ कब अपनी ओर निहारा