– शरद कोकास

संपूर्ण विश्व में पर्वों का संबंध मूल रूप से कृषि से ही रहा है. लोक जीवन में धर्म का समावेश हो जाने के पश्चात उन पर्वों को धर्म से जोड़ दिया गया और बहुत सुंदर पौराणिक कथाएं गढ़ी गईं.
मिथकों में कहीं न कहीं लोक जीवन का प्रतिबिंब दिखाई देता है. वैदिक काल में देव और असुर जीवन पद्धतियों के आधार पर देवासुर संग्राम एवं अवतारों की रचना हुई. इसी संदर्भ में नरक चतुर्दशी पर्व का कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध किये जाने की कथा से संबंध स्थापित हुआ.
वहीं मृत्यु उपरांत जीवन के विश्लेषण में स्वर्ग-नर्क की कल्पना की गई और मनुष्य को भयभीत किया गया. लोकजीवन में इसी आधार पर परंपराओं का निर्माण हुआ.
बचपन में नरक चतुर्दशी के दिन मां सुबह-सुबह जगा देती थी “उठो आज के दिन सुबह जल्दी नहाना पड़ता है वरना नरक में जाते हैं.” मुझे नर्क में जाना स्वीकार था लेकिन इतनी सुबह बिस्तर से उठना नहीं.
बहरहाल नहाने के समय फिर एक नया आदेश कि आज के दिन उबटन लगाकर नहाते हैं. बाबूजी कहते थे कि “जब आधुनिक युग में बढ़िया सुगंधित साबुन आ गए हैं तो उबटन की क्या जरूरत?”
लेकिन हम लोग लाइफबॉय यानी लाल साबुन से थोड़ा चेंज मिल जाए इसलिए पड़ोस की किराने की दुकान से “सुवासित उटणे” यानी सुगंधित उबटन की दस पैसे में मिलने वाली पुड़िया ले आते थे ,जिस पर लिखा रहता था कि इसमें हल्दी, चंदन, चावल का आटा, गुलाब जल, जाने क्या-क्या मिला है.
हम लोग इसी भ्रम में उससे रगड़-रगड़ कर नहाते थे और नर्क का पासपोर्ट कैंसल कर देते थे. बाद में पता चला कि इस दिन सुंदर बनने की कोशिश की जाती है इसलिए इसे रूप चतुर्दशी भी कहते हैं.
इसी कॉन्सेप्ट पर एक बहुत बड़ा बाजार निर्मित हुआ है जिसमें विभिन्न तरह के सौंदर्य प्रसाधन है, जिसमें आपको एहसास दिलाया जाता है कि बिना इस साबुन के लगाए आप सुंदर नहीं दिखाई दे सकते, बिना इस टूथपेस्ट के आपके दांत चमक नहीं सकते, बिना इस तरह के ब्रांडेड कपड़े पहने आप भिखमंगे दिखाई देंगे, इस शैंपू से बाल धोने पर आपके बाल राजकुमारों जैसे हो जाएंगे. यह पूरा मध्य वर्ग उपभोक्ता बनकर इसी बाजारवाद के शिकंजे में जकड़ा हुआ है. अब बाजार आप की धार्मिक भावनाओं को भी इनकैश करवा लेता है.
आजकल नरक चतुर्दशी वाला कांसेप्ट थोड़ा कम हो गया है रूप चतुर्दशी वाला अधिक हो गया है. आखिर सुंदर बनना तो सभी चाहते हैं. जो भी हो, नई पीढ़ी को ऐसे मिथकों के बारे में थोड़ा जानना चाहिए और केवल भारतीय ही नहीं बल्कि अन्य सभ्यताओं के मिथकों के बारे में भी क्योंकि नर्क तो जहन्नुम- हैल जैसे शब्दों के साथ हर धर्म और सभ्यता में विद्यमान है. साथ ही यह भी जानिए कि यह बाजारवाद और पूंजीवाद आपको किस तरह से क्या करता है और किस नर्क में आप जी रहे हैं. वैसे सुंदर दिखने की इच्छा तो आपकी भी होगी, तो सुबह-सुबह उठ कर नहा लीजिए और अपना नर्क का पासपोर्ट कैंसिल करवा लीजिए. आपको रूप चतुर्दशी की शुभकामनाएं.