प्रीता व्यास
हिंदी का नाम विश्व की सबसे बड़ी भाषाओं में तीसरे स्थान पर आता है. पिछले पचास वर्षों में इसके बोलने वाले भी बढे हैं और इसकी अपनी शब्द सम्पदा भी बढ़ी है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की जो वर्तमान स्थिति है उसकी मज़बूती के पीछे अपनी भूमि से दूर जा बसे प्रवासी लेखकों और हिंदी पठन-पाठन को प्रोत्साहित करने वाले भाषा-प्रेमी जनों का योगदान महत्वपूर्ण है. जहां – जहां (देशों या द्वीपों में) भारतवंशी जा कर बसे वहां- वहां उन्होंने हिंदी की अलख जगाई. भारत की आज़ादी के बाद दुनिया भर में हिंदी को जो मान्यता मिली वह अनेक भाषाओं के लिए स्वप्न ही है.
आकलैंड, न्यूज़ीलैंड में निवास कर रहे लेखक, पत्रकार, डिजिटल दुनिया के सिद्धहस्त और विश्व की पहली हिंदी वेब पत्रिका “भारत दर्शन” के संस्थापक/ संपादक रोहित कुमार ‘हैप्पी’ जी की इस सद्य प्रकाशित पुस्तक “न्यूज़ीलैंड की हिंदी यात्रा” में सन 1930 से लेकर 2021 तक की, यानि लगभग नब्बे वर्षों की हिंदी की इस दूर देश, न्यूज़ीलैंड, में हुई यात्रा का हवाला है. मेरा मानना है कि पुस्तक को पढ़ने पर विस्मय और गर्व की मिली- जुली अनुभूति होना स्वाभाविक है.
इस यात्रा का ब्यौरा इस बात का प्रमाण है कि रोहित कुमार ‘हैप्पी’ जी ने अपने शोध के श्रम में कोई कोताही नहीं बरती और ये यात्रा इस बात का प्रमाण है कि अंग्रेज़ीपरस्त माहौल में भी लोगों ने अपनी भाषा को न सिर्फ अपनाये रखा बल्कि उसके प्रसार के लिए सतत काम भी किया और अब भी कर रहे हैं. अपनी भाषा के प्रति इस आत्मीय लगाव की पृष्ठभूमि ही है जो कहीं ना कहीं हमारी सांस्कृतिक और संस्कारगत एकता का आधार बनती है.
पुस्तक के आरंभ में अपने समर्पण में अपनी बात स्पष्ट करते हुए रोहित जी लिखते हैं-” कथ्य सरल, सुलभ है, तथ्य खोजने पड़ते हैं लेकिन शोध तथ्य पर आधारित होता है, कथ्य पर नहीं. कथ्य को सत्य की कसौटी पर परखकर तथ्य उजागर करना किसी भी शोधार्थी और खोजी पत्रकार का कर्तव्य होता है. आवश्यक नहीं कि जो दिखाई देता हो, वह यथार्थ हो और यह भी सदैव नहीं होता कि यथार्थ सरलता से दिखाई पड़े. न्यूज़ीलैंड में हिंदी कर्म और श्रम करने वाले व्यक्तिओं व संस्थाओं. जिनमें कुछ मौन साधक भी सम्मिलित हैं, को मुखर करने हेतु यह पुस्तक एक नन्हा- सा प्रयास है.”

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा (भारत) से प्रकाशित 146 पृष्ठ की इस पुस्तक में न्यूज़ीलैंड में हिंदी को लेकर हो रहे कार्यों का समग्र ब्यौरा है, चाहे वह पत्रकारिता हो, लेखन हो, अध्यापन हो, विश्वफलक पर प्रतिनिधित्व हो, आयोजन हों या पर्यटन और फिल्मों की बात हो. कुल मिलकर ये पुस्तक अपने आप में संग्रहणीय दस्तावेज़ है.