डॉ. प्रेमलता मिश्रा

राई बुंदेलखंड का सर्वोत्कृष्ट लोक नृत्य है. मात्र राई कह देने से जैसे बुंदेलखंड के लोक रंग की आभा चारों ओर बिखर जाती है. यह एक बारहमासी नृत्य है, तभी सभी किस्म के उत्सवों, समारोहों, मांगलिक अवसरों तथा विभिन्न ऋतुओं में इसका प्रदर्शन दर्षकों को भावविभोर कर देता है. यह विधा बेहद प्राचीन है, इसके कई प्रमाण हैं. सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने पदमावत में राई नाचने वाली बेड़नी का उल्लेख किया है- “जानी गति बेडिन दिखलाई. बांह डुलाय जीउ लेई जाई”
मध्ययुगीन कवि केशवदास ने रामचंद्रिका में लिखा है –
“कहूं भाट भरयो कंकरे, मान पावे
कहूं लोलिनी बेडिनी गीत गावे.”
यदि किसी कांसे की थाली में कुछ राई के दाने डाल कर उसे थोड़ा सा खनखना दो या फिर छांछ में रई यानि मथानी बिलो कर मक्खन निकालो, ठीक उसी तरह इस लोक नृत्य में नर्तकी घूमती है, चक्कर लगाती है, बल खाती है. शायद तभी इस नृत्य को राई कहा गया. राई के संबंध में और कई भी मान्यताएं हैं जैसे कि इसके गीत राधा द्वारा कृष्ण को लुभाने के लिए गाये जाते थे, तभी राधा को एक ना म- राई भी दिया गया है.

एक मान्यता है कि राई शब्द संस्कृत के शब्द रागित, प्राकृत के रागी, राजसी और राधिका से बना. वैसे तो यह बुंदेलखंड का लोक नृत्य है लेकिन इसे चंबल, यहां तक कि राजस्थान के कुछ हिस्सों तक भी देखा जाता है. मान्यता तो यह भी है कि असल में राई के कलाकार आदिकाल में राजस्थान की तरफ से ही बुंदेलखंड आए थे. इन कलाकारों को राज-नर्तक का दर्जा मिला था. फिर पहले मुगलों और उसके बाद अंग्रेजों से अपनी आजादी को अक्षुण्य रखने के लिए बुंदेलखंडी राजे-रजवाड़े लगातार कोई तीन सौ साल लड़ते रहे. जान लें कि बुंदेलखंड कभी किसी का गुलाम नहीं रहा, लेकिन लगातार लड़ाई व बड़े साम्राज्यों से संघर्ष के चलते उनकी जागीरदारी व रजवाड़े कमजोर होते गए. फलस्वरूप राई कलाकारों को प्रश्रय मिलना बंद हो गया. वे सड़क पर आ गए. पन्ना का देवेन्द्रनगर, छतरपुर का बिजावर, दमोह का पथरिया जट जैसे कई गांव इन नर्तकों के ठिकाने बन गए. बदनाम हुए, मजबूरी में उन्हें देह व्यापार की ओर जाना पड़ा. आज एक बार फिर राई को शासकीय मान्यता व सम्मान मिल रहा है व राष्ट्रपति भवन तक इसका प्रदर्षन हो चुका है. फलतः इसकी रंगत लौट रही है.

मध्य प्रदेश के सागर संभाग के पांच, दतिया, और जबलपुर, सतना जिलों का कुछ हिस्सा और उत्तर प्रदेश के झांसी संभाग के सभी सात जिले बुंदलेखंड के पारंपरिक भू-भाग में आते है. बुंदेलखंड की विडंबना है कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक एकरूप भौगोलिक क्षेत्र होने के बावजूद यह दो राज्यों – मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में बंटा हुआ है. आजादी के बाद एक वक्त ऐसा भी आया जब राई खतरे में थी. इसके खिलाफ आंदोलन चले, इसे अश्लील माना गया. कई बार राजनेताओं की आलेाचना हुई कि वे राई देख रहे थे, अब लोकोत्सवों में भी राई कभी-कभार ही देखने को मिलती है.
ऐसा माना जाता रहा कि राई दैहिक श्रृंगार का नृत्य है. नृत्य में देह ही नाचती है- आत्मा नहीं. जबकि इसके पारंपरिक गीत देखें तो इसमें वैराग्य है, आस्था है, धर्म है, सौंदर्य भी है, लास्य है व गति है. राई के बोल में, ईसुरी की चौकड़ियां ही सर्वाधिक गाई जाती हैं. ईसुरी प्रेम, दैहिक श्रृंगार के उत्कट कवि के रूप में सम्मानित बुंदेलखंड के कंठ-कंठ में विराजे कवि हैं. उन्हें बारहों मास फगुनाया कवि कहा जाता है. फागुन में अनेक गांवों में राई के आयोजन होते हैं. फाग श्रृंगार और प्रेम का रंगोत्सव है. यह वर्जनाओं-कुंठाओं से मुक्ति का पर्व है. फाग के अलावा संपन्न वर्ग शादी-ब्याह, जन्म-दस्टोन के अवसर पर भी राई करवाते हैं. मरणासन्न के लिए महामृत्युंजय जाप की तरह राई का आयोजन आयुष्यवर्धक माना गया है. एक राई गीत है- ‘मुंह में नइयां दांत, बब्बा सेज को बिराजे.’
बुंदेलखंड में राई नृत्य करने का पारंपरिक कार्य बेड़िया समाज का है. इसके मर्द सामान्यतया निठल्ले होते हैं. परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेवारी स्त्रियों की होती है. इसके लिए परिवार की कम से कम एक बेटी को अविवाहित रखने की प्रथा रही है. वही नचनारी बनती है. राई के लिए नचनारी को उसके गांव जाकर ‘साई’ देकर न्योतना पड़ता है. नियत तिथि पर वह अपने संगतकारों के साथ आ जाती है. वह चूड़ीदार पायजामा पर लहंगा-चोली पहने होती है. नृत्य में उसका मुख ओढ़नी से ढका रहता है. नयनबाणों से न तो वह किसी को घायल कर सकती है और न ही अंग प्रदर्शन से उत्तेजित. वह पद और हस्त संचालन के जरिए ही शृंगारिक मुद्राओं को अभिव्यक्त करती है.
राई दममारु नृत्य है, पूरी रात चलता है. मिरदंगिया और नचनारी की छेड़छाड़, मान-मनुहार के बीच अनेक शृंगारिक मुद्राएं दर्शनीय होती हैं. राई में गाए जाने वाले गीतों की दो या चार पंक्तियां ही होती हैं. इसके कुछ गीत ये हैं- ‘तुम पे लाखों मरे, तुम नै मरीं बेला काऊ पे.’ ‘राजा हाथ न लगाओ, जोबन से महंगी है चोली.’ राई में गाये जाने वाले गीतों में खयाल, स्वांग, फाग, नाारदई और लग्गर आदि विविधताएं हैं जो गायन की द्रुत, मध्यम आर विलंबित गति के साथ-साथ विभिन्न रागों व लोक-रागों में ढले होते हैं. इसके धार्मिक गीतों में सरल, सहज और लोकसम्मत भाशा में प्रभु की सत्ता का बखान होता है जैसे –
वीर हनुमान, अरे वीर हनुमान, लंका में गरदा उड़ाई रे
या फिर
“सखी सौलह हजार, सखी सौलह हजार, उसमें कन्हैया अकेले
बंसी ऊसेई बजाओ बंसी ऊसेई बजाओ, जैसी बजाई थी वन में”
गीतों में श्रंगार, विरह, छेड़छाड़, ताने-बहाने सबसे ज्यादा लेाकप्रिय हैं-
“गोरी नैना ना मार, गोरी नैना ना मार
भरके दुनाली चाहे मार दे”.
हास-परिहास के माध्यम से लेाकरंजन, जीवन की विपदाओं, कष्टों और बाधाओं के बीच ये गीत और इसके साथ की थिरकन ग्रामीणों को तकलीफों को जीने की उर्जा प्रदान करते हैं.
यह भी सही है कि राई गीतों में समय के साथ कुछ अष्लीलता और द्विअर्थी संवाद आ गए हैं जो सभ्य समाज में अस्वीकारता का भाव पैदा करते हैं. बाजार की छाया ने इसे पारंपरिक स्वरूप और भावना को कतिपय पथ विमुख भी किया है, लेकिन इसके अनूठे तत्व अन्यत्र कहीं नहीं मिलते. आज इसमें हारमोनियम, बैंजो जैसे वाद्य इस्तेमाल हो रहे हैं लेकिन इनके सवाल-जवाब जैसे हिस्से आज भी लोगों को अचंभित कर देते हैं.
प्रश्न- भौंरी बेईमान. भौंरा बिलमाए लय बगीचन में.
उत्तर- भौंरा काय न भये, कलिन-कलिन रस लेतं.
या फिर
प्रश्न- उरिया को पानी बड़ेरी लों जाय. छैला की यारी अबे लों में पाय.
उत्तर- पापर को पत्ता डुलत नईयां. इन यारों की यारी मिटत नईयां.
उसके बाद तेज गति में नगड़िया बजती है, गीत भी तेज हो जाता है-
ई गारी तो आवे गोलाई दे के और ऐसे ठलुअन को मारे मिठाई दे के, नैना बंद लागे अई-अई ओ.
बुंदेली लोकनृत्य राई में बेड़नियों द्वारा फुर्ती के साथ रेंगड़ी, झमका, ढोलकी, मृदंग, नगडिया, झांझ और झींके जैसे वाद्ययंत्रों के समवेत तालों पर नृत्य किया जाता है. दीपावली के बाद प्रारंभ होकर आठ माह तक चलने वाला यह नृत्य रात में होता है. राई नृत्य की समय सीमा तय नहीं है. नृत्यकारा की क्षमता ही पैमाना मात्र है, कभी-कभी राई नृत्य 22-24 घंटे तक लगातार चलता है और बड़े लोगों में शादी-विवाह की रस्म इसके बिना अधूरी मानी जाती है.
इस नृत्य में लोग एक घेरा बनाकर खड़े हो जाते हैं. बीच में ग्राम्य नर्तकी ख्याल नामक गीत गाते हुए चक्राकार नाचती है और मयूर की भांति रह-रहकर अंगड़ाई लेती है. पुरुष ढोलकी बजाता है और यही ढोलकिया नर्तकी के साथ विशेष रंगत पैदा करता है. राई नृत्य मणिपुरी में जैगोई नृत्य के भांगी, पारंग से काफी साम्य रखता है. इस प्रकार राई शब्द राधिका से आया है और राधिका के नृत्य से राई नृत्य बना जिसमें केवल राधा ही कृष्ण को रिझाने के लिए नृत्य करती हो. कालांतर में इस नृत्य में गाया जाने वाला गीत राई कहलाने लगा.
मगर दूसरे विद्वान इसे विशुध्द रूप से आदिवासी नृत्य मानते हैं. चूंकि यह नृत्य मशाल की रोशनी में होता था और मशाल को बुझने न देने के लिए इसमें राई डाली जाती थी, इसीलिए यह राई नृत्य कहलाया. राई का सबसे मनोरंजक व अनूठा पक्ष है- वादविवाद. वाद्य बजाने वाले को जवाब देते हैं नर्तकी के घुंघरू. स्वर को जवाब देते हैं नर्तकी के बोल. अब तो बिजली की चमक-दमक में यह होता है, वरना पहले दल के साथ गति से मशाल चलती थी, ताकि नर्तकी के हाव-भावों को लोग देख सकें.
बेड़नियां यह नृत्य करते हुए, अपनी शरीर को इस प्रकार लोच और रूप देती हैं कि बादलों की गड़गड़ाहट पर मस्त होकर नाचने वाले मोर की आकृति का आभास मिलता है. इसका लहंगा सात गज से लेकर सत्तरह गज तक घेरे का हो सकता है. मुख्य नृत्य मुद्रा में अपने चेहरे को घूंघट से ढंककर लहंगे को दो सिरों से जब नर्तकी अपने दोनों हाथों से पृथ्वी के समानांतर कंधे उठा लेती है, तो उसके पावों पर से अर्द्ध चंद्राकार होकर, कंधे तक उठा यह लहंगा नृत्यमय मयूर के खुले पंखों का आभास देता है. नृत्य में पद संचालन इतना कोमल होता है कि नर्तकी हवा में तैरती सी लगती है.
इसमें ताल दादरा होती है. पर अंत में कहरवा अद्धा हो जाता है साथ में पुरूष वर्ग लोग धुन गाता है. नृत्य की गति धीरे-धीरे तीव्र होती जाती है. राई में ढोलकिया की भी विशिष्ट भूमिका होती है. एक से अधिक ढोलकिए भी नृत्य में हो सकते है. ढोलकिए नाचती हुई नर्तकी के साथ ढोलक की थाप पर उसके साथ आगे-पीछे बढ़ते हैं, बैठते हैं, चक्कर लगाते हैं. नृत्य चरम पर होता है तो ढोलकिया दोनों हाथों के पंजों पर अपने शरीर का पूरा बोझ संभाले हुए, टांगें आकाश की ओर कर, अर्द्धवाकार रेखा बनाकर आगे-पीछे चलता है. इस मुद्रा में इसे बिच्छू कहा जाता है. राई नृत्य में नर्तकी की मुख्य पोशाक लहंगा और ओढ़नी होती है वस्त्र विभिन्न चमकदार रंगों के होते हैं. दोनों हाथों में रूमाल तथा पांवों में घुंघरू होते हैं. पुरूष (वादक) बुंदेलखंडी पगड़ी, सलूका और धोती पहनते हैं. राई के मुख्य वाद्य ढोलक, डफला, झींका, मंजीरा, तथा रमतुला हैं.
बुंदेल खंड की लोकजन संस्कृति में सामाजिक तथा जातीय गुणों को पेशेवर तरीके से सामाजिक परिवेश में जोड़ने के लिए विभिन्न नृत्यों की परंपरा विद्यमान है. सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन के दौर में संक्रमण काल से गुजर रहें बुंदेली भूभाग में लोक नृत्य अब विलुप्ति की कगार पर पहुंच गये है. बुंदेली लोक नृत्य परंपराओं को बचाने के लिए समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो यह नष्ट हो सकती है या फिर विलुप्त. हालांकि म.प्र. शासन के संस्कृति विभाग ने राई को लोकनृत्य शैली के तौर पर मान्यता दी है. आकाषवाणी व दूरदर्षन में इसका आयोजन हो रहा है. लेकिन जरूरत इस बात की है कि गैर बेडिया समाज भी इस कला को सीखे, इसे अपनाए. इस लोक नृत्य को बचाने के लिए बुंदेलखंड में ही लोक संस्कृति केन्द्र की स्थापना जरूरी है तभी बुंदेली लोक गीत नृत्य, तथा लोक वाद्य सुरक्षित और संरक्षित रह सकेगें.