राजस्थान की हरियाली तीज

कपिल जोशी

राजस्थान त्योहारों की धरती है. यहां समय-समय पर मनाये जाने वाले त्योहार व मेले आम जन-जीवन में नवीन उत्साह वह उमंगों का संचार करते हैं. भारतीय संस्कृति में पर्वों का विशेष स्थान रहा है. हमारे राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है-

“तीज त्योंहारा बावडी,ले डूबी गणगौर”

यानी कि राज्य में श्रावण मास की शुक्ल तृतीया से त्योहारों का आगमन होता है तथा चैत्र शुक्ल तृतीया को त्योहारों का समापन हो जाता है. उसके बाद तीन महिने बड़े ही नीरस बीतते हैं. राज्य में यूं तो बहुत से त्योहार मनाये जाते हैं मगर उनमें तीज व गणगौर का स्थान महत्वपूर्ण है. तीज से ही वर्षा का प्रारंभ माना जाता है,भयंकर गर्मी से तपते मरूस्थल में छाये काले बादल नाचने पर मजबूर कर देते हैं. उमड़ते-घुमड़ते काले बादलों के बीच मयूरों का नाचना,कोयल का बोलना वह मरूस्थल के ऊंचे धोरों पर दौड़ते हुए मृग व झूला झूलती महिलायें इस त्योहार की शोभा बढा देती हैं.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए इस व्रत का पालन किया था. परिणामस्वरूप भगवान शिव ने उनके तप से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था. माना जाता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने सौ वर्षों के तप के उपरांत भगवान शिव को पति रूप में पाया था. इसी मान्यता के अनुसार स्त्रियां माता पार्वती का पूजन करती हैं. विवाहिता महिलायें व्रत रखती है, इस व्रत को अविवाहित कन्यायें  योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की चाहत के लिए करती हैं.

विवाहित महिलाएं अपने मायके जाकर ये तीज का त्योहार मनाती हैं. जिन लड़कियों की सगाई हो जाती है, उन्हें अपने होने वाले सास-ससुर से सिंजारा मिलता है. इसमें मेहंदी, लाख की चूड़ियां, कपड़े मिठाई विशेषकर घेवर शामिल होता है. तीज पर हाथ-पैरों में मेहंदी भी जरूर लगाई जाती है. इसी दिन वृक्ष पूजा का भी विशेष महत्व है.


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