रो पाने का सुख (कर्नाटक की लोक कथा)

अनुवाद: प्रीता व्यास

एक ज़माने में एक महिला थी जिसे एक दिन लगा कि दिल पर बड़ा बोझ है चुपचाप रो लेना चाहिए. फिर लगा उसे कि किसी के सामने रो पाऊं तो ज़्यादा तसल्ली मिले.
लेकिन किसके सामने? कौन होगा ऐसा जो उसके आंसू राज़ रक्खेगा?
सो उसने इस दुविधा का हल निकाला. उसने आटा पीसा, गूंथा, उसकी एक गुड़िया बनाई, पका कर तैयार की और सोचा कि इसे सुनाऊंगी दिल में छिपा सब दर्द और इसके सामने फूट – फूट कर रोऊंगी.
गुड़िया तैयार थी लेकिन इससे पहले कि वह उसे कुछ सुनाती उसके बच्चे घर लौट आए. एक को कुछ चाहिए दूसरे को कुछ. वह उनके कामों में अटक गई. जो सबसे छोटी थी उसने गुड़िया उठाई और कहा “मां, ये कितनी सुंदर है. मैं इसे लेकर खेलने जाती हूं बाहर.”
वह उसे मना ना कर सकी. मन ही मन सोचा उसने कि मेरे भाग में रो पाने का सुख बदा ही नहीं है.

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