डॉ. भूपेंद्र बिष्ट

धूप को पेड़ों से जाते हुए देखने के दिन आने को हैं. पहाड़ों पर महीने की शुरुआत संक्रांति (सूर्य के राशि परिवर्तन) की तिथि से ही मान ली जाती है, जैसे आज भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी: अनंत चतुर्दशी है और यहां आश्विन लग भी गया. यह वर्षा काल के इति और शीत काल के अथ की बात भर नहीं है, असोज का महीना पहाड़ में कामकाज का महीना है. कामकाज से आशय कि आसन्न सर्दियों के लिए अभी से एक मुकम्मल तैयारी कर ली जावे. कठिन भूगोल तथा विकट जिजीविषा के चलते भी कुछ उत्स और इत्मीनान को फील किया ही जाय- ऐसा कुछ.

इसमें दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य की मंगल कामना करता एक लोक पर्व “खतडवा” बड़े उल्लास और प्रीति भाव से मनाया जाता रहा है. इस दिन पुरुष पशुओं के गोठ की सफाई कर, धूप बाती के साथ खूंटे का तिलक करते हैं और पशुओं के लिए कोमल घास – फूस का बिछावन भी तैयार करते हैं. महिलाएं तो इस दिन पशुओं की अतिरेक में सेवा कर ही सुख पाती हैं, उनको हरा-भरा पौष्टिक चारा हाथ से खिलाती हैं, उन्हें पलाशती (cherish) हैं. वे गौशाला के पास समवेत स्वर में लोक गीत भी गाती हैं:
“औसों ल्युलो, बेटुलो ल्यूलो, गरगितो ल्युनलो
गाड़ गधेरन बटी, भ्यार, भूढ़ बटी….
इक गोरू बटी गोठ भरी जाओ”…..
अर्थात्, (मैं तुम्हारे लिए अच्छा सा पौष्टिक चारा, नदी, खाई व जंगलों से ढूंढ कर लाऊंगी. तुम दीर्घायु रहना. तुम्हारी इतनी वंश वृद्धि हो कि पूरा गोठ (cowshed) भर जाय.)
शाम को बाख़ली (मकानों के समुच्चय के आगे का सभी के लिए बनी बैठकी गाह) के मध्य में एक pole गाड़ कर उसमें चौतरफा सूखी घास लकड़ी, झाड़ी-झिकडे, पिरूल और छिलुके डाल कर पुतला बनाया जाता है, इसे खतडू या कथडकू (अभिधार्थ है, दुखदाई वस्तु) कहते हैं. इसे प्रज्वलित करके सभी एकत्रित जन घेर लेते हैं और एक त्रिशूलनुमा हरी लकड़ी, जो फूलों से गुंथी होती है और उसमें अनिवार्यतः कांसे की फूलदार शाख नत्थी रहती है, से पुतले को पीटते हुए कहते हैं :
“निकल बुडी, पस नारायण”, यानी दरिद्रता निकले, भगवान का वास हो.
और फिर कच्चे हरे खीरे का प्रसाद सबको खिलाया जाता है. आग समाप्त हो जाने के बाद लोग राख का प्रतीकात्मक टीका भी लगाते हैं और कुछ लोग तप्त कोयले घर को भी लेे जाते हैं. दरअसल इसे पहाड़ों में जाड़ों को लेकर अभी से एक हिम्मत जुटाना समझा जाय.

धारचूला व मुनस्यारी के धुर क्षेत्रों में तो इसे बहुत गर्मजोशी से मनाने की प्रथा है. वहां शौका जनजाति के लोग इस दिन किसी ऊंचे टीले पर चढ़ “पुल्या” नाम से दो पुतले (He & She) बनाते हैं और रात भर नाचने-गाने का उत्सव चलता जाता है. ऐसा भी माना जाता है कि जो युवती इस शाम खिलखिलाकर हंसती है, वह ससुराल में हमेशा फिर खुशहाल ही रहती है. नेपाल के कुछ इलाकों और सिक्किम में भी इस पर्व को मनाने का रिवाज़ है, हां गढ़वाल अंचल में यह नहीं मनाया जाता.
Leave a Reply