वसंत पंचमी: प्रकृति के परिवर्तन की आहट

– प्रवीणा त्रिपाठी

जब शीतलता घटने लगती है और ताप प्रबल हो जाता है, जब आम्र मंजरियां गुच्छों में अमराई सजाने लगती हैं, जब पुष्प-पुष्प से श्याम भ्रमर कुछ हाल पूछने आते हैं, जब डाल-डाल पर कोयलिया की कूक सुनाई देती है, जब महुए की मादक सुगंध मन को तन को हर लेती है, सखी तब आता है ऋतुराज. सभी ऋतुओं का जो सरताज, हृदय में ले आता उल्लास, दृगन की मिट जाती फिर प्यास.

वसंत ऋतु का वर्णन यूं तो कवियों ने अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया है लेकिन छह ऋतुओं की अग्रणी यह ऋतु प्रकृति के परिवर्तन की आहट लेकर आती है, नव श्रृंगार, नव कलेवर में सजे वसंत का आगमन ही मानव मन को ऊर्जा प्रदान करता है, गेंहूं की सुनहरी होतीं बालियां, सरसों के पीले फूलों से भरे लहलहाते खेत धन-धान्य और समृद्धि का संदेश देते हैं, प्रकृति हमें सिखाती है कि जीवनचक्र क्या है? पेड़ों पर बूढ़े हो चले पके पीले पत्ते विदा लेते हैं, और नव किसलय अपनी कोंपलों पर अधमुंदी पलकों से निहारते हैं इस पल-पल बदलते संसार को, हज़ारों प्रकार के पुष्प खिलने को आतुर होते हैं ज्यों सजाना चाहते हो धरती को एक सुंदर बाला के रूप में, कनेर, चम्पा, चमेली, गेंदा, गुलाब, रातरानी अपनी सुगंध और रूप से वातावरण महका देते हैं, शायद प्रकृति का यही रूप देख कवि पद्माकर लिखते हैं-

कूलन में केलिन कछारन में कुंजन में,

क्यारिन में कलिन-कलीन किलकंत है.

कहै पद्माकर परागन में पौन हू में,

पानन में पिकन पलासन पगंत है.

द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में,

देखो दीप-दीपन में दीपत दिगंत है.

बीथिन में ब्रज में नबेलिन में बेलिन में,

बनन में बागन में बगरो बसंत है.

वसंत केवल ऋतु सौंदर्य ही नही बल्कि संगीत, शिक्षा, संस्कार और संस्कृति की संवाहक भी है. वाग्देवी माता सरस्वती का प्राकट्य दिवस है वसंत ऋतु की पंचमी तिथि, हमारे पुराणों के अनुसार भगवान ब्रम्हा ने जब सृष्टि की रचना पूर्ण कर ली तो उन्हें लगा कि अभी भी कुछ अपूर्णता है और सृष्टि शांत और मूक है तब उन्होंने अपने कमंडल से अभिमंत्रित जल छिड़का  जिससे चार भुजाओं वाली एक स्त्री प्रकट हुईं जिनके  एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में पुस्तक, तीसरे हाथ में माला और चौथा हाथ वरमुद्रा में था, ब्रम्हा जी ने देवी को वीणा के तार छेड़ने को कहा और जैसे ही वीणा की मधुर स्वरलहरियां वातावरण में गूंजी, हर ओर उल्लास छा गया, नीरवता समाप्त हो गयी, नदियों ,झरनों, पक्षियों और समस्त जीवमात्र के स्वर फूट पड़े, सभी को वाणी प्राप्त हो गयी तब ब्रम्हा जी ने उन्हें वाणी की देवी सरस्वती कहा.

वसंत पंचमी के दिन से ही छोटे बच्चों को अक्षर ज्ञान कराया जाता है, उनका पट्टिका पूजन किया जाता है. भारतीय साहित्य, संगीत शास्त्र, नृत्य और वादन शास्त्र के ज्ञाता, छात्र और शिक्षक वसंतपंचमी पर मां वीणापाणि की साधना और आराधना करते हैं ताकि उनका ज्ञान सदैव बढ़ता रहे.

वसंत ऋतु, ऋतु परिवर्तन की आहट भी है, क्योंकि वसंतपंचमी के बाद से ही दिन बढ़ने लगते हैं, गर्मी का आरंभ होता है और साथ ही पतझड़ का भी. गर्म हवाएं चलने लगती हैं और खेतों में खड़ी गेंहूं और चना की फसल पकने लगती है.

लोक परंपरा की बात करें तो बुंदेलखंड में वसंतपंचमी दिन होता है मकरसंक्रांति को मिट्टी के घोड़ों पर लादी गयी कठारी को उतारने का उसमें भरा हुआ मीठा, शक्कर से बना हुआ गढिया-गुल्ला, सेव, खुरमी, शकरपारे और पैसे कन्याओं में बांट कर सबकी समृद्धि का आशीष मांगा जाता है. हमारी लोक परंपराएं और लोक कथाएं अनंत हैं ये हमारे मानस पटल पर यूं अंकित रह जाती हैं जैसे अभी कल ही की बात हो. हम भविष्य के सपने बुनते अपनी जड़ों से चाहे कितनी ही दूर निकल आये हों, हमारी परंपराओं, संस्कारों और हमारी लोकसंस्कृति ने हमें आज भी बांधे रखा हैं, हम हाथी, घोड़े, बैल, गाय सभी की स्तुति करते हैं.

पेड़ों में पीपल, बरगद, आम, नीम, आंवला, टेसू, बिल्व, पान  सबका महत्व है ,हमारी नदियां, तालाब झरने ये सब कहीं न कहीं हमारी आस्था, पूजा और लोक से जुड़े हुए हैं, दरअसल ये सारी सृष्टि एक-दूसरे से जुड़ी हैं, सभी के लिए सभी जरूरी है और जब हम इंसान ये बात समझने लगेंगे तभी सबका अस्तित्व बचा रहेगा. पंचतत्व में समाया है ब्रम्हा का सारा सृजन, ये सारतत्व जानते हुए आइए मनाएं इस बसंत में जीवन का आनंद.

  • प्रवीणा त्रि

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