– राजेंद्र परदेसी
वह खाना खाकर सोने के लिए लेट गया लेकिन नींद आ नहीं रही थी उसे. उसकी आंखें बांस की मुंडेर देख रहीं थीं और मन, वह तो पता नहीं कहां था. तभी तो परबतिया कब आयी उसे पता भी न चला. कमरे का दिया भी परबतिया के साथ आयी हवा से बुझ गया था. अंधेरे में पता नहीं चल रहा था कि वह जग रहा है या सो रहा है. अतः टोह लेने के लिए वह बोली- “सो गए क्या?”
“नहीं तो, ऐसे ही लेटा हूं.” बिना हरकत किये वह बोला.
परबतिया को तो बात बढ़ानी थी इसीलिए फिर बोली- “क्या सोच रहे हो?”
“कुछ तो नहीं”.
“फिर बोलते क्यों नहीं?”
“क्या बोलूं?”
“सुबह चले जाओगे क्या?”
वह कुछ देर तक सोचता रहा फिर बोला- “हां, छुट्टी कल ही तक तो है, परसों ड्यूटी करनी है.”
सुबह के बिछोह की कल्पना की नागिन ने डस लिया. परबतिया के मुख से निकला- “कुछ दिन और रुक क्यों नहीं जाते?”
पीड़ा उसे भी साल रही थी लेकिन करे क्या पेट जो बीच में आ जाता है. फिर भी दुखी मन से कहा-कैसे रुकूं, छुट्टी भी बाकी नहीं है, रुक जाऊंगा तो पैसा कट जायेगा, फिर यहां दिक्कत हो जाएगी, वैसे जैसा तुम कहो.”
“मैं क्या बताऊं? तुम तो खुद समझदार हो. परसों चंदर आया था, कह रहा था कि तिवारी के यहां से जमीन छुड़ा लो, वह बटाई पर जोतने को तैयार है.”
फिर अपनी सलाह देते हुए कहा- “अच्छा भी रहेगा चार- छह क्विंटल अनाज तो साल में घर आ जायेगा, अभी तो यही देखना पड़ता है कि कब तुम्हारे पास से पैसा आये कि घर में दाना आये.”
“इसीलिए तो जा रहा हूं कि तुम लोगो को तकलीफ न हो.”
फिर दोनों विवशता की चादर में सिकुड़- सिमट गए.