– गीत चतुर्वेदी
तीन तरह की वृद्धताएं होती हैं:

पहला, आयुवृद्ध. जो व्यक्ति उम्र से बूढ़ा हो गया हो. ऐसे लोग बहुतायत में होते हैं क्योंकि सबकी आयु बढ़ेगी, सभी वृद्ध होंगे, लेकिन आयुवृद्ध होने वाला व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ भी हो, यह ज़रूरी नहीं. सौ साल की आयु वाला व्यक्ति भी मूढ़ हो सकता है. अर्थात आयु कभी निर्णायक श्रेष्ठता नहीं हो सकती.
दूसरा, तपोवृद्ध. वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन में घनघोर तप किए हों. वह भले आयुवृद्ध न हो, लेकिन वह आयुवृद्ध से श्रेष्ठ होगा, क्योंकि भरपूर तप ने उसकी आयु को खरा बनाया होगा. उसने साधारण जीवन न जिया होगा, बल्कि तप से अपने जीवन को यथेष्ट गहराई दी होगी. यहां तप यानी विभिन्न किस्म की साधना.
तीसरा, ज्ञानवृद्ध. वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन में भरपूर तप किया हो और उससे ज्ञान भी प्राप्त किया हो. कई लोग तप तो कर लेते हैं, किंतु उससे ज्ञान नहीं प्राप्त कर पाते, इसलिए तपोवृद्ध से भी बेहतर है ज्ञानवृद्ध, क्योंकि उसके पास तप की भी पूंजी है और ज्ञान की भी, जो कि दुर्लभ है. ऐसे व्यक्ति की आयु कम भी हो, तो भी वह श्रेष्ठ होगा, क्योंकि चालीस की उम्र में ही उसने साठ जितना तप कर लिया होगा और अस्सी जितना ज्ञान पा लिया होगा. पैंतीस की उम्र में ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले शाक्यमुनि भी ज्ञानवृद्ध ही कहलाएंगे.
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