– पल्लवी त्रिवेदी

“क्या मम्मी सुबह सात बजे से नहला दिया और सोना था ना अभी.” घर के बाहर चिड़ियां चहचहाती और घर के भीतर हम चिड़चिड़ाते.
“जल्दी तैयार हो जाओ नुक्कड़ वाली आंटी के घर खाना खाने जाना है.” मम्मी का फरमान जारी होता.
“नईंईं मम्मी, इत्ती सुबह से खाना? हम नईं जा रहे. और इन आंटी के घर तो बिलकुल नई जायेंगे, बहुत ही सड़ियल खाना बनाती हैं. बिना नमक के आटे की लिजलिजी सी पूड़ी, बिना घुले चावल की खीर और ठंडी आलू की टिल्ल सब्जी. हमसे नईं खाई जाती. ऊपर से कन्या भोज के बाद केवल दस पैसे देती हैं.”
हम 12 बरस की नन्ही उम्र में इकट्ठे हुए अपने हृदय विदारक अनुभवों का उल्लेख बड़ी कातरता से करते.
“ज्यादा बातें मत करो. जाना है, माने जाना है. और इसके बाद फलानी आंटी, ढिमाकी आंटी के यहां जाना उसके बाद फिर वो वाली आंटी और फिर उनके पड़ोस वाली आंटी के घर भी जाना है. अभी सात बजे से शुरू करोगी तब बारह बजे तक सबके घर निपट पायेंगे.”
हम बेचारी कन्याएं निकल पडतीं नवरात्रि की सालाना जंग पर. सुबह आठ बजे सबसे खराब खाने से शुरुआत कर यहां-वहां विभिन्न प्रकार का खाना (यहां भिन्नता खाने की क्वालिटी में हैं, मेनू सभी जगह कमोबेश समान है) गले से उतारते हुए लास्ट खाना उन आंटी के घर का रखतीं जहां का खाना सबसे स्वादिष्ट होता था.
जिन घरों में टी.वी. देखने जाने पर या घर के अंदर बॉल चले जाने पर या फूल तोड़ने पर साल भर कर्कश ध्वनि में कटु शब्द सुनने की आदत थी, उन घरों में आज श्रद्धा पूर्वक चरण छुए जाते, माथे पर टीका लगाया जाता, मनुहार कर करके भोजन कराया जाता और ना-ना करते भी दो पूड़ी और थाली में पटक दी जातीं. ये बताने पर भी कि “आंटी हम सात घरों में खाना खाकर आये हैं, एक पूड़ी से ज्यादा न खा पायेंगे”, इन निष्ठुर आंटियों को जरा भी तरस ना आता. इन्हें अपना बनाया खाद्य पदार्थ देवी जी के गले में उड़ेलने की जल्दी मची रहती. जाने किस पूजा की किताब में किस दुष्ट ने लिख दिया होगा कि “मिलने वाला पुण्य सीधे-सीधे कन्या के पेट में पहुंचने वाली सामग्री के समानुपाती माना जावेगा.”
जो कन्याएं नवमी के दिन साक्षात देवी का स्वरुप नज़र आतीं उन आंटियों को. अगले दिन से वही कन्याएं पानी के लिए भी न पूछी जातीं. कभी गलती से खेलते- खेलते कह दो ” आंटी प्यास लगी है, पानी पिला दो”, तो जवाब मिलता ” बेटा, हम ज़रा बाहर जा रहे थे, अपने घर जा कर ही पी लो.”
कन्याएं दस घरों में अपनी क्षमता से दस गुना खाना ठूंसकर, फट पड़ने को आतुर पेट पर हाथ रखे लगभग पांच रुपये कमाकर लस्त-पस्त घर लौटतीं और घर आते ही पलंग पर चारों खाने चित्त हो जातीं. यही पांच रुपये उस वक्त वह एक मात्र चीज़ थी जो इस अत्याचार को सालों साल बर्दाश्त करने की सहनशक्ति देती रही.
और फिर शुरू होती इस भयानक भोजन को पचाने की कठिन क्रिया. आंतें जी भरकर कन्याओं को कोसतीं. कन्याएं आंटियों को ही कोसने बैठ जातीं. शाम को मम्मी से खिचड़ी या दाल चावल बनाने की गुहार लगती.
और फिर अगली नवरात्रि तक ये कन्याएं देवी से दुबारा साधारण छोकरियां बन जातीं जो डांटने-पीटने के काम आतीं.
आजकल शायद देश दुनिया के विकास के क्रम में पिज़्ज़ा नूडल्स और बर्गर कन्या भोजन में परोसे जाने लगे हैं और अगर कन्या का पेट फुल हो तो भोजन बांधकर घर ले जाने की सुविधा भी प्रदान की जाने लगी है. पर हम अपने भीतर के डर का क्या करें मित्रो कि आज भी उस खाद्य सुनामी की याद आते ही पेट हाजमोला की डिमांड करने लगता है. और आज भी कहीं आलू के दो मोटे टुकड़े वाली टिल्ल सब्जी, सूजी का ठंडा हलवा या चावल की पतली खीर में ऊपर तैरती दो चिरौंजी देख लें तो डर के मारे फुरैरी आ जाती है.