सफ़ेद बादलों के देश में:  न्यूज़ीलैंड के हिंदी कवियों का पहला काव्य संग्रह

रोहित कृष्ण नंदन

“सफ़ेद बादलों के देश में”, ये नाम है न्यूज़ीलैंड के पहले हिंदी काव्य संग्रह का जिसमें आकलैंड शहर में बसने वाले तीन कवियों की रचनाएं शामिल हैं. इसका प्रकाशन भारत से हुआ सन 2019 में. इसका संपादन किया है हिंदी की जानी- मानी लेखिका प्रीता व्यास ने और इसके प्रकाशन का श्रेय बोधि प्रकाशन को जाता है. 

सफ़ेद बादलों का देश यानी न्यूज़ीलैंड. पूरी दुनिया से अलग-थलग, दक्षिणी ध्रुव के पास, दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित एक संप्रभु देश है न्यूज़ीलैंड. इस हरे- भरे देश की धरती पर पहुंचने वाला सबसे पहला कबीला माओरी था. न्यूज़ीलैंड पर माओरी लोगों ने 1250 से 1300 ईस्वी के बीच पहली बार डेरा जमाया था. जब वे यहां आये तो उन्होंने देखा कि यहां का आसमान कभी बादलों से खाली नहीं रहता, सफ़ेद बादल हमेशा ही चहलक़दमी करते रहते हैं आसमान पर. उन्होंने फिर इसे नाम दिया था- अओतेयारोआ (Aotearoa) यानि सफ़ेद बादलों का देश. 

पूर्व ब्रिटिश कॉलोनी न्यूज़ीलैंड एशिया- पैसिफ़िक क्षेत्र के सबसे समृद्ध मुल्कों में से एक है. आज के न्यूज़ीलैंड की बात करें तो इस देश की आबादी क़रीब 44 लाख है, जिन्हें कीवीज़ कहा जाता है. इनमें 69% यूरोपीय मूल के, 14.6% स्वदेशी माओरी, 9.2% एशियाई और 6.9% गैर माओरी पैसिफ़िक आइलैंडर हैं. विदेश मंत्रालय के मुताबिक क़रीब दो लाख भारतीय और भारतीय मूल के लोग न्यूज़ीलैंड में रहते हैं. इसके अलावा तीस हज़ार भारतीय छात्रों ने पढ़ाई के लिए इस देश को चुना है. हर साल नए लोग भारत से यहां पहुंचते हैं आंखों में सपने लिए.

 कारोबारी रिश्तों की पड़ताल की जाए तो भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच साल 1952 में दोतरफ़ा रिश्तों की शुरुआत हुई थी. दोनों देशों के बीच साल 2015 से 2018 के बीच दोतरफ़ा कारोबार भी लगातार बढ़ रहा है जो साल 2018 में 1.91 अरब डॉलर रहा था. भारत न्यूज़ीलैंड को फ़ार्मास्युटिकल दवाएं, कीमती धातु और आभूषण, कपड़ा, मोटर व्हीकल भेजता है और वहां से मिनरल फ़्यूल, वुड पल्प, ऊन और फल मंगाता है.

बर्फ़ से ढंके ग्लेशियर, हरियाले पहाड़, ख़ूबसूरत मैदानी इलाक़े, तालाब-झीलें, नीला आसमान, और समंदर का किनारा, यहां आपको सब कुछ मिलेगा. प्रकृति का वरदान है ये. इस खूबसूरती को बढाती है इसकी एथनिक डायवर्सिटी. आंकड़े बताते हैं कि यहां 213 विभिन्न ऐथनिक ग्रुप्स बसते हैं. दुनिया भर में कहीं भी इतने ज़्यादा जाति समूह एक साथ नहीं रहते. अब देखें कि हम हिंदुस्तानी कितने हैं इस सुंदर देश में. जनसंख्या के हिसाब से जो पांच बड़े जाति समूह हैं उनमें हम भारतीय चौथे नंबर पर हैं, सबसे पहले आते हैं न्यूज़ीलैंड यूरोपियन, दूसरे पर माओरी, तीसरे चीनी और चौथे हम भारतीय.

आजीविका के लिए विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं भारतीय, नौकरीपेशा भी हैं तो कारोबारी भी. बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने यहां की नागरिकता स्वीकार कर ली है लेकिन दिल में अब भी हिन्दुस्तान धड़कता है. अपनी जड़ों से जुड़े रहने की छटपटाहट उस पीढ़ी में साफ़ दिखती है जो अपना वतन छोड़ कर किसी वजह से इस धरती पर आ कर बसी. अपनी कला-संस्कृति, आचार-व्यवहार, खान-पान, भाषा-साहित्य को जिलाये रखने का प्रयास जारी रहता है. यहां भाषा को लेकर जो भी काम हो रहा है, मुख्य धारा के हिसाब से भले ही वह नगण्य हो लेकिन कम से कम प्रयास है और यही अपने आप में सराहनीय बात है. साहित्य की मुख्य धारा वाले लेखक और आलोचक उस लेखन को साहित्य की कसौटी पर भले ना रखें लेकिन उसे अपनी भाषा को जीवित रखने के प्रेम की कसौटी पर रखा जा सकता है.

सफ़ेद बादलों के देश के तीन कविओं की रचनाएं इस संग्रह में समाहित हैं- रोहित कुमार ‘हैप्पी’, सोमनाथ गुप्ता ‘दीवाना रायकोटी’और दिनेश भारद्वाज. न्यूज़ीलैंड दुनिया के छोर पर ज़रूर है लेकिन यहां के कवियों की दृष्टि से जगत की घटनाएं छूटती नहीं. दुनिया में जो कुछ घट रहा है, प्रेम, युद्ध, असमानता, अत्याचार, भ्रष्टाचार, लूट सब उतरती है संवेदनशील रचनाकार की कलम से. प्रीता व्यास जी ने अपनी भूमिका में इसका उल्लेख किया है. रोहित कुमार हैप्पी अपनी एक छोटी सी कविता के माध्यम से सवाल खड़ा करते हैं –

 “दो हैं रास्ते –

तुम उनका दमन करो

या वे तुम्हारा दमन करें.

क्या कोई और रास्ता नहीं?

ना हम उनका दमन करें,

न वे हमारा दमन करें?”

समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है. लोगों का आपसी मेल जोल का सामाजिक ढांचा भी बदल गया है. लोग आपस में एक-दूसरे से मिलें या ना मिलें, एक-दूसरे को जाने या ना जानें लेकिन सोशल मीडिया पर सब जुड़े रहते हैं. फेसबुक के प्रति दीवानगी के इस दौर पर बहुत सटीक और सुन्दर व्यंग करती हुई उनकी रचनाये समय की नब्ज़ पर हाथ होने का सबूत हैं-

“सॉरी…नो फोटो…

मेरे पिताजी का अभी-अभी देहांत हो गया.

फोटो खींचनी अलाउड नहीं थी.’

कुछ कमेंट्स आए –

‘ओह, आखरी वक्त में आप फोटो भी नहीं खींच पाए.’

‘अस्पताल को फोटो खींचने देना चाहिए था.’

‘RIP’

‘RIP’

‘अंतिम विदाई की फोटो जरूर अपलोड करना’

पिताजी चले गए थे.

वो खुश था.

इतने ‘लाइक’ और ‘कामेंट्स’ उसे पहले कभी नहीं आए थे.”

आप दुनिया में कहीं भी जाकर बस जाएं कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं. इंसान के दुःख-सुख, सपने, आदतें, व्यवहार सब वही रहते हैं. मानव जीवन की विडंबनाएं कहाँ बदलती हैं. मानव जीवन से जुड़े मूलभूत प्रश्न वही रहते हैं, उसके संबंध और सरोकार वही रहते हैं.सोमनाथ गुप्ता ‘दीवाना रायकोटी’ जी की पंक्तियां हैं-

हर दिल में कमोवेश दर्द है

हर चहरे पे थोड़ी-बहुत गर्द है. 

एक बात जो विदेशों के बारे में जाहिर है कि यहाँ हर व्यक्ति के पास मूलभूत सुविधाएँ होती हैं, बल्कि वो सब भी जो अब भी आम हिन्दुस्तानी के लिए लग्ज़री की श्रेणी में आया है. लेकिन क्या भौतिक सुविधाओं का मिल जाना सुखी हो जाना है? सुखी से सुखी आदमी के तलवों में भी दर्द की कीलें गढ़ी मिल जायेंगीं. सोमनाथ जी लिखते हैं-

“सब कुछ चेहरे पे कहाँ लिखा होता है

हर दिल में इक दर्द छुपा होता है.”

दिनेश भारद्वाज जी की कविताएं बड़ी सहज कवितायेँ हैं. भाव की अभिव्यक्ति इतनी प्रखर है कि शिल्प का बोध आड़े नहीं आता, शब्दों का सरल सा लबादा ओढ़ कर निकल पड़ी हैं रचनाएँ. विदेश लोग आ तो जाते हैं लेकिन शुरूआत में जीवन यहाँ कितना कष्टप्रद होता है, कितना संघर्षमय ये दिनेश भारद्वाज जी की कविताओं में सहज झलकता है-

“अकेला मैं इस शहर में,

ज़िन्दगी के तीसरे पहर में”.

 आप ज़मीन के किस टुकड़े पर रहते हैं इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. दर्द की तासीर ज़मीन के साथ नहीं बदलती. सबके लिए उम्र भर खटने के बाद का ये अहसाह कितना आहात करता है-

“रद्दी जितनी क़ीमत हो गई है मेरी.

पुराने अख़बार की तरह

फट गया हूं जगह- जगह से मैं”.

देखा जाए तो कविता की यात्रा भी लगभग उतनी ही पुरानी है जितनी मानवता के इतिहास की. इतनी लंबी यात्रा में दुनिया भर के कवियों ने कविता में हर विषय को समाहित किया है. कविता का फलक बहुत विस्तृत हो चुका है. आज के समय में कविता में कोई नई बात पिरो पाना बड़ा कठिन काम है. हमारे समय के कवियों के लिए लेखन शगल नहीं है, चुनौती है. कुछ लोगों का मानना है कि जो इस चुनौती को नज़रअंदाज करते हुए लिखते हैं वे समय और शब्द व्यर्थ खर्च करते है.

लेखन अपने आप में ही एक दायित्व-बोध है और सामाजिक सरोकार के बिना कोई लेखन संप्रेषित नहीं हो पाता.  सच है, लेकिन मुझे याद आ रहा है कथादेश (जनवरी, 2019) में छपा कथाकार भालचंद्र जोशी जी का साक्षात्कार वे कहते हैं “लिखते समय मन में ऐसा कुछ (सोद्देश्यता) नहीं होता. जो लिखते समय एक उद्देश्य लेकर लिख लेते हैं, या उद्देश्य लेकर लिखने बैठते हैं ऐसे लेखकों को देखना या मिलना चाहता हूँ. न सामाजिक सरोकार और न कला की कोई सोद्देश्यता, कुछ नहीं बस जो लिखना है, जो लिख रहा हूं.”

जो मन में है उसे सहजता से कागज़ के हवाले कर देने का काम किया जाए, ये कविता हुई या नहीं हुई ये जानकारों का सिरदर्द है. “सफ़ेद बादलों के देश में” काव्य संग्रह  आप भी पढ़ें, आनंदित हों और आप ही तय करें कि कविता हुई या नहीं.

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