– रामेश्वर महादेव वाढेकर
समकालीन साहित्य का अध्ययन करने के पश्चात समझ आता है कि स्त्री विमर्श,दलित विमर्श,आदिवासी विमर्श,मुस्लिम विमर्श,अल्पसंख्यक विमर्श,वृद्ध विमर्श,किन्नर विमर्श आदि पर गंभीर चर्चा हुई है. वर्तमान समाज में किन्नर को हिजड़ा, खुसरो,अली,छक्का आदि नाम से पुकारा या पहचाना जाता है. किन्नर के चार प्रकार हैं- बचुरा, नीलिमा, मनसा,हंसा. बचुरा वर्ग के किन्नर वास्तविक हिजड़े होते हैं. वे जन्म से न स्त्री होते हैं ना पुरुष. नीलिमा वर्ग में वे हिजड़े आते हैं, जो किसी परिस्थितिवश या कारणवश स्वयं हिजड़े बन जाते हैं. मनसा वर्ग में वे हिजड़े आते हैं जो मानसिक तौर पर स्वयं को हिजड़ा समझने लगते हैं. हंसा वर्ग में वे हिजड़े आते हैं, जो किसी यौन अक्षमता की वजह से स्वयं को हिजड़ा समझने लगते हैं. किन्नर समाज विश्व के हर क्षेत्र में समाहित हैं. वे मनुष्य ही हैं, सिर्फ़ उनमें प्रजनन क्षमता न होने से समाज हीन नजर से देखता है. हिंदी साहित्य में शुरुआती दौर में पाण्डेय बेचन शर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, शिवप्रसाद सिंह, वृंदावन लाल वर्मा आदि ने किन्नर समाज की समस्या पर लिखा किंतु समस्या का हल वर्तमान में भी नहीं.

हिंदी साहित्य में किन्नर समाज की समस्या पर अनेक उपन्यास लिखे गए और वर्तमान में भी लिखे जा रहे हैं. प्रमुख उपन्यासों में ‘यमदीप’ – नीरजा माधव, ‘मैं भी औरत हूं’ – अनुसुइया त्यागी, ‘किन्नर कथा, ‘मैं पायल’ – महेंद्र भीष्म, ‘तीसरी ताली’ -प्रदीप सौरभ, ‘गुलाम मंडी’ – निर्मल भुराड़िया, ‘प्रतिसंसार’ – मनोज रूपड़ा, ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’ -चित्रा मुद्दगल आदि. उपरोक्त उपन्यासों का अध्ययन करने के पश्चात किन्नर समाज की त्रासदी, संघर्ष समझ आता है. किन्नर समाज की प्रमुख समस्या में शैक्षिक समस्या, बहिष्कृत समस्या, पारिवारिक समस्या, विस्थापन समस्या,आवास समस्या, रोजगार समस्या, देहव्यापार समस्या,वेश्या समस्या,यौन हिंसा समस्या आदि है. इन समस्याओं के साथ किन्नर समाज वर्तमान में भी संघर्ष कर रहा है. वर्तमान में किन्नर समाज के संदर्भ में कानून है किंतु अस्तित्व में कुछ नहीं. वे आज भी खुद की पहचान समाज में निर्माण नहीं कर सके. समकालीन उपन्यासों में किन्नर समाज की विभिन्न कठिनाइयों एवं उनके संघर्ष को संवेदनात्मक स्तर पर प्रमुखता से उठाया गया है. इन्हीं संवेदना एवं संघर्ष को सहजने की कोशिश हम करेंगे.
शैक्षिक संघर्ष
किन्नर के ज़िंदगी में जन्म से संघर्ष शुरू,मृत्यु तक जारी. मां-बाप खुद की संतान को स्वीकार करने की मानसिकता में नहीं, ऐसा क्यों? यह वर्तमान में चिंतन का विषय है. बचपन में शारीरिक बदलाव होने के कारण अनेक परिवार के सदस्य बच्चे को अस्पताल लेकर जाते हैं. बच्चा किन्नर है, पता चलने के पश्चात स्वीकारने की स्थिति में कोई नहीं रहता, उसे किन्नर बस्ती में छोड़ा जाता है या जान से मारने की कोशिश की जाती है. किन्नर बस्ती में वह बड़ा तो होता है, किंतु शिक्षा से वंचित. उसने पढ़ाई करने का ठानी भी तो समाज व्यवस्था पढ़ने नहीं देती. किन्नर समाज के शैक्षिक संघर्ष के संदर्भ में नीरजा माधव ‘यमदीप’ उपन्यास में कहती है, “माता, किसी स्कूल में आज तक किसी हिजड़े को पढ़ते, लिखते देखा है? किसी कुर्सी पर हिजड़ा बैठा है? मास्टरी में, पुलिस में, कलेक्ट्री में-किसी में भी,अरे! इसकी दुनिया यही है, माताजी कोई आगे नहीं आएगा कि हिजड़ों को पढ़ाओ, लिखाओ, नौकरी दो, जैसे कुछ जातियों के लिए सरकार कर रही हैं।”
नंदरानी’ के माध्यम से नीरजा माधव ने किन्नर समाज का शैक्षिक संघर्ष बया किया है. आज भी अनेक माताएं किन्नर संतान होने के बावजूद पढ़ाना चाहती हैं किन्तु पुरुष सत्ता के सामने कुछ नहीं कर पातीं. वर्तमान में कई ‘नंदरानी’ शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही हैं. तकरीबन 2014 तक किन्नर समाज का लिंग ही निश्चित नहीं था, शिक्षा तो बहुत दूर. कोई सरकार उनकी तरफ ध्यान नहीं देती. जिस तरह स्री, पुरुष को पढ़ने का संवैधानिक अधिकार है,उसी प्रकार किन्नर को भी है. वर्तमान में कानून है, सिर्फ अस्तित्व में नहीं. कुछ गिने-चुने किन्नर संघर्ष करके पढ़े हैं, किन्तु उन्हें अच्छे पद पर नियुक्ति नहीं मिलती. उनके साथ भेदभाव किया जाता है. जब तक समाज की सोच बदलेगी नहीं, तब तक किन्नर समाज का संघर्षमय जीवन जारी रहेगा,कानून के बावजूद.
बहिष्कृत प्रथा के विरुद्ध संघर्ष


किन्नर को खुद का परिवार नहीं स्वीकारता, समाज तो बहुत दूर. संविधान में सभी लोगों की तरह किन्नर समाज के भी मूलभूत अधिकार हैं. किंतु किन्नर समाज के मूलभूत अधिकार का हनन होता है. उन्होंने न्याय मांगने की कोशिश भी की तो न्याय नहीं मिलता, अन्याय निरंतर होता है. वर्तमान में भी समाज उन्हें बहिष्कृत कर रहा है. इज्जत से जीने नहीं देता. चित्रा मुद्दगल ‘पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपारा’ उपन्यास में बहिष्कृत प्रथा के संघर्ष संदर्भ में कहती हैं, “कभी-कभी मैं अजीब सी अंधेरी बंद चमगादड़ों में अटी सुरंग में स्वयं को घुटता हुआ पाता हूं. बाहर निकलने को छटपटाता मैं मनुष्य तो हूं ना? कुछ कमी है मुझमें, इसकी इतनी बड़ी सज़ा.” ‘विनोद’ के माध्यम से बहिष्कृत संघर्ष चित्रा मुद्दगल ने साझा करने की कोशिश की है. वर्तमान में किन्नर समाज त्रासदी में जी रहा है, सामाजिक मानसिकता के वजह से. वह किन्नर है ये उसका दोष नहीं. वह मनुष्य ही है, स्त्री की कोख से पैदा हुआ. समाज को उन्हें सम्मान देना चाहिए, बहिष्कृत नहीं करना चाहिए. उनके साथ प्रेम से,मिलजुलकर रहना होगा, तभी उनमें जीने की आस निर्माण होगी.
पारिवारिक संघर्ष
किन्नर का संघर्ष समाज से नहीं, परिवार से शुरू होता है. विश्व में चिकित्सा विज्ञान ने बहुत प्रगति की है. किन्नर संतान को परिवार से दूर करना,यह उसका उपाय नहीं. उसके भविष्य के संदर्भ में सोचने की जरूरत है. समाज क्या कहेगा रिश्तेदार क्या सोचेंगे? हमारी इज्जत का क्या होगा? आदि प्रश्न गौण हैं, खुद की संतान के सामने. पारिवारिक संघर्ष के संदर्भ में महेंद्र भीष्म ‘किन्नर कथा’ उपन्यास में कहते है, “सामाजिक परिस्थितियों, खानदान की इज्जत- मर्यादा,झूठी शान के सामने अपने हिजड़े बच्चे से उसके जन्मदाता हर हाल में छुटकारा पा लेना चाहते है.” लेखक ने ‘सोना’ नामक पात्र के माध्यम से किन्नर का संघर्ष दिखाने की कोशिश की है. उपन्यास का पात्र ‘जगत सिंह’ अपने खुद के बेटे ‘सोना’को जान से मारने की कोशिश करता है, क्योंकि वह किन्नर है. वर्तमान में कई ‘सोना’परिवार के प्रेम को तरस रहे हैं. किन्नर को समाज ने अपमानित किया तो ज्यादा दुःख नहीं होता, किंतु परिवार ने मुंह फेर लिया, तो बहुत दुःख होता है. वर्तमान में कई परिवार किन्नर संतान को परिवार का हिस्सा नहीं मानते. किसी में अधिकार नहीं मिलता. पारिवारिक समारोह में इच्छा होकर भी जा नहीं पाता. सिर्फ़ यादों में जीता है. उन्हें कोई सहारा नहीं देता. हर तरफ से मानसिक और शारीरिक शोषण होता है.


परिवार के सदस्य को मानसिकता बदलने की जरूरत है. वे अपनी संतान की वेदना नहीं समझेंगे,तो कौन समझेगा? मनुष्य को ऐसे संवेदनशील विषय पर चिंतन की जरूरत है. विस्थापन संघर्ष वर्तमान किन्नर समाज की भीषण समस्या है विस्थापन. किन्नर खुद घर से निकल जाते है,तो कभी उसे जबरन निकाला जाता है. दोनों अवस्था में संघर्ष ही है. बच्चा किन्नर है, समझ आने के पश्चात उस पर का प्रेम खत्म होता है परिवार एवं समाज का. उसके साथ परिवार के सदस्य, रिश्तेदार बुरा बर्ताव करते है. हर दिन के मानसिक और शारीरिक त्रासदी से परेशान होकर जान तक देता है. परिवार ने छोड़ने के पश्चात समाज ज्यादा वेदना देता है. जीना मुश्किल करता है. मजबूरी में किन्नर समुदाय का डेरा खोजने की कोशिश करता है. वहां भी उसका मुखिया के द्वारा शोषण ही होता रहता है. विस्थापन संघर्ष के संदर्भ में महेंद्र भीष्म ‘किन्नर कथा’ रचना में कहते है, “प्रत्येक हिजड़ा अभिशप्त हैं, अपने ही परिवार से बिछुड़ने के दंश से. समाज का पहला घात यही से उस पर शुरू होता है. अपने ही परिवार से, अपने ही लोगों द्वारा उसे अपनों से दूर कर दिया जाता है. परिवार से विस्थापन का दंश सर्वप्रथम उन्हें ही भुगतना होता है.” वर्तमान में भी किन्नर समाज का विस्थापन संघर्ष दिखाई देता है. वे सुरक्षित दिखाई नहीं दे रहे. वे बेघर हैं उन्हें कोई सहारा नहीं देता. मजबूरी का फायदा उठाते है, मनुष्य के रूप में रहनेवाले जानवर. समाज उनके लिए भले ही कुछ न करे, चलेगा किंतु उनके ज़िंदगी से न खेले. जिस दिन किन्नर समाज को सही में न्याय मिलेगा, तभी लोकतंत्र अस्तित्व में है, यह किन्नर को महसूस होगा.
आवास संघर्ष
किन्नर बेघर है वर्तमान में भी. उन्हें रहने के लिए भी कोई किराए पर घर नहीं देता. किन्नर के रूप में जन्म लेना कोई गुनाह नहीं है.