हमारी ग्रामीण नवरात्रि: तब और अब

विजयशंकर चतुर्वेदी

बचपन के गांव में सारे त्यौहार ऋतुओं और कृषि से जुड़े होते थे, बाज़ार न के बराबर था. नवरात्रि के दौरान शरद के निरभ्र आकाश, गुनगुनी ठंड और वर्षा ऋतु की हालिया विदाई के बाद चहुं ओर सुथरी हरीतिमा के असर में एक किस्म की सात्विकता दिन-रात झरती रहती थी.

नवागंतुक दुर्गा मैय्या को गुड़, नारियल, केले, फूटा, रिउरी दाना चढ़ाने की होड़ मचती थी. कुंवारी कन्याओं को खिलाने, व्रत रखने और नवांहपारायण करने का उत्साह हम बालकों में देखते ही बनता था. सुबह जल्दी नहा कर देवी दाई को जल ढारने की उत्तेजना का बखान नहीं किया जा सकता. पूरे इलाके से किसिम-किसिम के फूल और बेलपत्र जमा कर लाना हमें सेवा का सर्वोच्च आयाम लगा करता था. बड़े-बुजुर्गों की आश्वस्तिकारी उपस्थिति में हर बालक खुद को आह्लादकारी आल्हा समझता था. चतुर चूहों और चालाक कुत्ते-बिल्लियों से सामग्री की रखवाली करने के चौकन्नेपन में पूरी रात्रि मैय्या के पंडाल में ही बीत जाया करती थी.

भंडारे और प्रसाद के लिए हर घर से शुद्ध देसी घी, आटा, दाल, तेल, नमक, सब्जियों का ढेर लग जाया करता था. यह सामूहिकता का त्यौहार था. लेकिन अब सबने अपनी-अपनी दुर्गाएं गांव में ही बांट ली हैं, और हर जगह बाज़ार ही बाज़ार है.

पहले देवी दाई की मढिया में एक दुर्गा प्रतिमा रखी जाती. अब गांव के सभी मोहल्लों में आठ-दस प्रतिमाएं रखी जाने लगी हैं. पहले प्रतिमा लाने दूर शहर जाना होता था, अब हमारा गांव इनका केंद्र बन गया है. पहले बाहर से आकर बंगाली कारीगर ये प्रतिमाएं बनाते थे, अब गांव में ही मूर्तिकार तैयार हो गए हैं. एडवांस बुकिंग होती है. आसपास के दस-बीस गांवों में प्रतिमाएं यहीं से जाती हैं.

पहले चुनरी, माला, मातारानी का साज-श्रृंगार, फूल, फल, लाउड स्पीकर, कैसेट बजाने की मशीन आदि लाने शहर जाना पड़ता था. अब डीजे समेत सारा तामझाम और रंगीनियां गांव में ही उपलब्ध हैं. पहले माताओं-बहनों की चुनरियों और चादरों से दुर्गा मैय्या की आड़ बन जाती थी. अब भव्य पंडाल गांव के टेंट हाउस से बनाए जाते हैं.

पहले माता के भजनों में भक्तिभाव और मधुरता होती थी. महिलाएं मंजीरे बजाते हुए सामूहिक भक्ति गीत गाती थीं. ढोलक और नगड़िया बजाते हुए गांव के लोग अपने एक कान को दबाकर माता की रोमांचकारी भगतें गाते थे और भाव में झूमने लगते थे. अब चार बजे सुबह से लेकर एक बजे रात तक मचने वाले कानफोड़ू शोर से दिल का दौरा पड़ जाने का खतरा पैदा हो जाता है. गाने भी जैसे धमकी दे रहे हों. प्रतिमा निवेदन के समय कारीगर के कारखाने पर ही एटम बम जैसे पटाखों के धमाके किए जाते हैं. ट्रैक्टर ट्रालियों की रेलमपेल में सड़क मुंह बाए कराहती रहती है.

बाज़ार ने पूजा-पाठ कराने वाले ब्राह्मणों और कुछ गांव वालों को रोज़गार तो अवश्य दिया है, लेकिन भक्तिभाव झीना हो गया है. प्रतिमाओं की ऊंचाई, चढ़ावा, सजावट की भव्यता, डीजे की तीव्रता आदि के मामले में एक दूसरे से की जाने वाली स्पर्धा गांव वालों, खासकर नवयुवकों को गर्वोन्मत्त कर देती है. धार्मिक कार्यकलापों में राजनीतिक और जातिगत उभार साफ नज़र आता है.

अभी की तस्वीरों में कारखानों से अपने-अपने स्थान ग्रहण करने जा रही दुर्गा प्रतिमाएं नज़र आ रही हैं. यह लिखते समय दुर्गा स्थापना करा रहे पंडितों के मंत्र दशों दिशाओं से मुझ तक पहुंच रहे हैं.

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