– बाबूलाल दाहिया
मुझे भोपाल के एक होटल से रानी कमला पति स्टेशन आना था. आटो वाले ने पूछा तो रानी कमलापति नाम ही भूल गया अस्तु जल्दी में कह दिया हबीब गंज. वह मुस्लिम ड्राइवर सुधारते हुए बोला, “अच्छा रानी कमलापति स्टेशन?”
मैंने कहा “हां.”
दरअसल उसे रोज सवारी लाते ले जाते रानी कमलापति रट गया होगा पर मेरी जुवान पर वही पुराना ही चढ़ा था. इसी तरह मैं प्रयाग राज को भी अक्सर इलाहाबाद कहने की भूल कर बैठता हूं.
कुछ वर्षों से शहरों के नाम बदलने की मुहिम तो चली ही थी पर अब बोल चाल में आए फारसी और अंग्रेजी के नामों पर भी कुछ लोग अपनी संकीर्ण मानसिकता थोपने लगे हैं. पर उनसे कौन कहे कि जब हिंदू, हिंदुस्तान ही विदेशियों का दिया हुआ नाम है तो हिंदुओं की भाषा हिंदी में शुद्धता ढूंढ़ना भी ‘फूस में फांस ढूढ़ना’ जैसे मुहावरे को चरितार्थ करना ही है, क्योंकि उसकी बुनियाद में ही सम्मिश्रण है.
हमने गांधी जी के भाषण पढ़े हैं. नेहरू जी के भाषण नज़दीक से सुने हैं, और उनकी पुस्तक भारत एक खोज भी पढ़ी है. पर उनके भाषण और लेखन में हिंदी नहीं हिंदुस्तानी रहा करती थी. उन भाषणों में हिंदी-उर्दू का अंतर न के बराबर था. लगता है आजादी के पश्चात ही हिंदी अधिक संस्कृत निष्ठ होकर अपना अलग रूप गढ़ती चली गई और उसकी बहन उर्दू भी अधिक फारसी निष्ठ होती गई.
पर यकीन मानिए हिंदी की अपनी ताकत उसकी उदारता ही रही है. जो शब्द सहज, सरल, बोधगम्म बोल-चाल में स्वीकार्य हैं चाहे जिस भाषा के हों हिंदी ने आत्मसात किया अस्तु भाषा लोचदार या मुहावरेदार बनी. उसने यह परहेज नहीं किया कि वह शब्द फारसी के हैं या अंग्रेजी के. भाषा और लिपि दोनों यूं भी मनुष्य का नैसर्गिक नहीं अर्जित ज्ञान है. मैं गांव में रहता हूं और यह अनुभव किया है कि लोग सरल सहज ग्राह्य शब्दों को तो अपना लेते हैं पर कठिन को छोड़ देते हैं. कुछ अटपटे शब्दों के बजाय उसके गुण धर्मों के अनुसार नए नाम भी रख देते है. मोटर साइकिल को फटफटिया या आइपोमियां का नाम बेसरम रखना उनके उसी नामकरण के परिचायक हैं.
वे रेल के इंतजार में बैठे हों तो यह कभी भी नहीं कहते कि “आज लौह पथगामनी विलंब से आएगी,” बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त मानते हैं कि “ट्रेन लेट है.” जब कि इस वाक्य में 66% इंग्लिश और सिर्फ “है” भर हिंदी का क्रिया पद है. पर एक ही अक्षर 66% इंग्लिश को हिंदी बना देता है. हमें चाहिए कि अपनी हिंदी को इसी प्रकार सामर्थवान बनाते रहें. शुरू-शुरू में तो भाषा के रूप में मनुष्य के मात्र आंखों के इशारे या हाथ के संकेत ही रहे होंगे. ठीक उसी प्रकार जैसे मूक बधिर लोग सब कुछ समझ लेते हैं. यदि कुछ शब्द मुंह से फूटते भी रहे होंगे तो उसी तरह जैसे भूखा बछड़ा “ओ मां” की लंबी आवाज मुंह से निकालता है और उत्तर में गाय भी हुंकार भरती है. पर तब ग्वाला या किसान भी उनकी भाषा समझ जाता है कि “बछड़ा भूखा है और गाय उसे दूध पिलाना चाहती है.”
भाषा मात्र उर्दू, हिंदी, संस्कृत या अंग्रेजी भर नहीं है. प्राचीन समय में देश में सैकड़ों ऐसी बोलियां थीं जो एक-दूसरे से अलग-अलग थीं और हर एक समुदाय की अपने -अपने सीमित कार्य क्षेत्र की जरूरत की भाषा ही हुआ करती थीं. तब संचार के साधन आज जैसे नहीं थे और विवाह संबंध आदि 50-60 किलो मीटर के दायरे में ही होते थे अस्तु उस सीमित क्षेत्र की लोक व्यौहार की एक अलग तरह की भाषा ही बन जाती थी. इसलिए भाषा कोई भी हो, महत्वपूर्ण उसके भाव होते हैं.
2017 की बात है जब हमारा 5 सदस्यीय दल 40 जिलों के परंपरागत ‘बीज बचाओ’ यात्रा अभियान में था और बैतूल जिले के एक गांव में रुका था. हमें वहां ठहरा देख वहां के कोरकू समुदाय ने रात्रि में हमारे सम्मान में एक लोक नृत्य का कार्यक्रम रखा. कोरकू आदिवासियों की अपनी एक अलग बोली है जिसे वहां बसने वाले अन्य समुदाय यादव, रहांगडाले, ठाकरे, विसेंन आदि भी नहीं समझते. जब उनके द्वारा गाए गए गीत का अर्थ हमने एक कोरकू टीचर से पूछा तो गीत के भाव को समझ हम खुद ही आश्चर्य चकित रह गए. वह गीत कोरकू युवकों को संबोधित था जिसमें कहा गया था कि- ” देखो रे ! आज हमारे बीच यह मेहमान आए हैं, अस्तु उनकी सेवा और सुविधा में कोई कमी मत रखना?” तो यह थी अपढ़ कोरकू लोगों की हमारे प्रति मेहमानवाजी की वैचारिक अभिव्यक्ति.
हमारी बोली बघेली है और पड़ोसी क्षेत्र के जिलों की बुंदेली परंतु न तो बुंदेली को बुंदेला राजपूत बनारस या मिर्जापुर से बुंदेलखंड में लाए थे ना ही,बघेल राजा गुजरात से बघेली को लाए होंगे क्योंकि उनके पहले भी बुंदेलखंड में चंदेल, खंगार, लोधी, भर एवं गोड़ राजवंश शासन करते थे और बघेलखंड में कोल, वेनवंशी, गोंड़, बालंद आदि राजा हुए थे. इसलिए सिद्ध है कि यह वर्तमान बघेली-बुंदेली पहले भी किसी न किसी लोक व्यौहार की भाषा के रूप में विकसित रही होंगीं.
पिछले वर्ष जब मैं कोल जनजाति पर शोध, सर्वेक्षण कर रहा था तो कोरकू की तरह ही कोल समुदाय की भी एक अलग “हो” नामक भाषा के कुछ संकेत मिले थे. “हो” का अर्थ उस कोलारियन भाषा में मनुष्य होता है. हो सकता है प्राचीन बघेली कोलों की “हो” भाषा से ही विकसित हुई हो जो अन्य समुदायों के यहां बस जाने के कारण बदल गई हो? पर उसके अवशेष आज भी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू व संस्कृत की परिधि से बाहर राउत, रउताइन, गउटिया, गउटिन आदि सम्मान जनक पद एवं उनका जोहार नामक अभिवादन लोक व्यौहार में मौजूद हैं.
शहर में रहने वाले किसी व्यक्ति से यदि पेड़ों के नाम पूछे जाएं तो वह 20-25 नाम बताकर चुप हो जायगा. परंतु यहां के कोल, गोंड, भुमिया एवं बैगा आदिवासी एक सांस में ही सैकड़ों नाम बता देंगे. इसलिए सिद्ध है कि पेड़- पौधों, वनस्पतियों ,नदियों, पहाड़ों के रखे गए नाम यहां के प्राचीन निवासियों के ही रहे होंगे. बाद में पढ़े लिखे लोगों ने प्रलेखीकरण करके यानि लिपिबद्ध करके उन्हें अपना बना लिया होगा. जैसे हमारे पास संरक्षित 200 प्रकार की परंपरागत धानों के नाम तो किसानों के रखे हुए हैं, पर आज वह हमारे पास लिपिबद्ध हैं तो लोग हमारी मानने लगे हैं.
इसलिए वक्त का तकाजा है कि भाषा विचार की अभिव्यक्ति का माध्यम ही रहे, पूजा की वस्तु नहीं जो देवालय में सजाकर रख दी जाए. क्योंकि जैसे- जैसे संचार का दायरा बढ़ता है भाषा में भी एकरूपता आती जाती है.