– रजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

आचार्य कुबेरनाथ राय ने देवी-पूजा को केन्द्र में रख कर तीन महत्त्वपूर्ण शोध निबन्ध लिखे थे जो श्री गुलजारीलालनन्दा के मानवधर्ममिशन के पत्र नवजीवनपथ में प्रकाशित हुए. उन्होंने देवीपूजा के विकास को पांच सोपानों में देखा है.
1. गणों और कबीलों की स्थानीय मातृकायें.
2. एक आदिम मातृका.
3. मातृका का दार्शनिक रूपान्तर – त्रिपुरसुन्दरी.
4. रहस्यवादी रूप – कुंडलिनी, प्रज्ञापारमिता, ह्लादिनी आदि.
5. आधुनिक मनोविज्ञान द्वारा उद्घाटित मातृका के मूलगत संस्कार- बिंब जो लोकचित्त का नियमन कर रहे हैं.
उन्होंने विंध्याचल के परिवेश का अध्ययन किया और बतलाया है कि विंध्य पर्वत पर स्थित अष्टभुजा का मन्दिर आभीरकुल की देवी है. (यशोदागर्भ-संभवा के रूप में सप्तशती में इसका उल्लेख है). कालीखोह का मन्दिर निषाद-कुल का है, जहां आज भी पुरोहित निषाद ही हैं, ब्राह्मण नहीं. आचार्य कुबेरनाथ राय कहते हैं कि विंध्यारण्य किसी जमाने में महिषारण्य था. आदिम निषादों ने ही जंगली महिष को पालतू बनाया और उसका दूध दुहा था. उनका कथन है कि आदिम-निषाद ने कहीं महिष को मित्रभाव से देखा है तो कहीं शत्रुभाव में, असुर-रूप में. चंडी मूलत: शिकार की देवी है. उनकी मान्यता है कि महिषासुर-मर्दिनी की परिकल्पना इसी आदिम-निषाद की देन है. उन्होंने महाराष्ट्र के कुछ गड़रिये-कबीलों में देवीपूजा का उदाहरण दिया है, जिसमें मातृकाएं महिष की पत्नियां हैं. जैसे जोगुबाई का पति है- म्हतो बा. यह महिष-देवता है.
भारत में देवीपूजा का बहुत प्राचीन इतिहास है. लोकपरंपरा में भी और वेद-परंपरा में भी. अनेक अध्येताओं ने देवीपूजा के इतिहास में समाज के विकास के सोपानों की पहचान की है. श्री देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखी थी- लोकायत. उसमें एक निबंध का शीर्षक है- गौरी. उन्होंने लोकपरंपरा में देवीपूजा का क्रम विकास सभ्यता के तीन चरणों प्रस्तुत किया है-1. मृगया -जीवी, 2. गोचारण और 3. कृषिजीवी. उनका मत है कि चंडी की परिकल्पना मृगया-जीवी संस्कृति की परिकल्पना है. जबकि महिषासुरमर्दिनी की परिकल्पना गोपसंस्कृति की परिकल्पना है. महीमाता और अन्नपूर्णा कृषि से संबंधित है.
श्री देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की मान्यता है कि कबीला-मनोभूमि में नारी-सत्ता या मातृसत्ता का प्राधान्य होता है. वे कहते हैं कि गौरी कृषि की देवी हैं. शस्यपार्वती. वे मानते हैं कि नारी-देवता या देवियां अपने मूल-रूप में कबीलों की देन हैं. उन्होंने बीली, मग्गा, डोम, गदवा, ओक्काल, गोल्ला, हाड़ी, हल्लीकर, हेलवा, इडिगा आदि देवियों के नाम भी उद्धृत किये हैं.
कबीलों के जमाने में जो स्थानीय मातृदेवियों की परंपरा थी, वह आज भी लोकजीवन में मौजूद है. सिंधुघाटी में जो एक मातृका-रूप है, वह उसके आगे का विकास है. पार्वती और सती की गाथा का जैसा दार्शनिक रूपांतरण हुआ – महात्रिपुरसुन्दरी, त्रैपुरसिद्धान्त, कुंडलिनी और प्रज्ञापारमिता के रूप में मातृ-उपासना का रहस्यवादी रूप विकसित हुआ, जिसकी परंपरा प्राग्वैदिक-तन्त्र में और आगे योग, वज्रयान, कौलाचार और सहजयान में भी देखी जा सकती है.