(माओरी लोक कथा का प्रीता व्यास द्वारा अनुवाद)

बहुत पुरानी बात है. दादी की दादी की दादी से भी बहुत- बहुत पहले की. सफ़ेद बादलों के देश में समुद्र के किनारे बसे एक गांव (Kainga)में एक सुंदर महिला रहती थी जिसका नाम था रोना. रोना अपने पति और दो बेटों के साथ रहती थी. रोना जितनी सुंदर थी उतनी ही गुस्सैल. उसका पति उससे बहुत प्यार करता था लेकिन रोना का गुस्सैल स्वभाव कभी- कभी उसे बहुत दुखी कर देता. बच्चे भी उसके कोप भाजन बनते रहते थे.
एक दिन की बात है. चांद खूब चमकीला था. रोना के पति ने कहा “इन दिनों रात में अच्छी चांदनी बिखरी होती है, मैं सोचता हूं दोनों बेटों के साथ दूर समंदर में जाऊं, खाड़ी की ओर, वहां भरपूर मछलियां मिल जायेंगीं और लौटने में रात को चांदनी की वजह से कोई दिक्कत भी नहीं होगी.”
“अच्छा,” रोना ने कहा.
उसके पति और बेटों ने मछली पकड़ने का सामान उठाना शुरू किया. जाल, कांटा, चारा, सब सामान अपनी नौका पे लाद कर वे चलने को हुए तो रोना के पति ने कहा ” हम कल रात तक लौटेंगे, हमारे लिए खाना बना कर रखना। “
“अच्छा,” रोना ने कहा.
रोना किनारे खड़ी तब तक देखती रही जब तक नाव आंखों से ओझल नहीं हो गई फिर वह लौट आई.
अगले दिन शाम के वक़्त उसने खाना पकाने की तैयारी शुरू की. उन दिनों गैस के चूल्हे, या स्टोव या बिजली के चूल्हे तो होते नहीं थे. लकड़ियां इकट्ठी करके लाना पड़तीं थीं. फिर एक गड्ढे में उन्हें एक के ऊपर एक इस तरह जमाना पड़ता था कि आंच हर ओर बराबर फैल सके. फिर जब लकड़ियां अच्छी तरह से सुलग जायें तो उनके ऊपर कुछ साफ़, एक-से पत्थर जमाए जाते जिन पर मछली, आलू आदि रख कर पकाया जाता. इसे हांगी (Hangi) कहते हैं माओरी.
रोना लकड़ियां लाई,मंझोले आकार के पत्थर लाई, गड्ढे में से पुरानी राख साफ़ की और हांगी की तैयारी शुरू की. उसने गड्ढे में पहले सूखी पत्तियां बिछाईं, फिर छोटी लकड़ियां जमाईं , फिर उनके ऊपर कुछ ज़्यादा बड़ी और मोटी लकड़ियां लगाईं. जंगल में मिलने वाले छोटे सफ़ेद फूलों वाले एक ख़ास पेड़ काइकोमाको (Kaikomako)की लकड़ी के टुकड़े एक दूसरे सफ़ेद छाल वाले पेड़ महोइ (Mahoe)की लकड़ी के टुकड़े से रगड़ कर आग पैदा की. फिर ऊपर पत्थर जमाए. इस तरह हांगी तैयार करके वह अपने परिवार जनों के लौटने की राह देखने लगी.
पकाने के लिए रखे पत्थर लाल दहक उठे. अंधेरा भी बढ़ने लगा. अब समंदर में दूर तक देख पाना कठिन था. रोना को दूर समंदर से गाने की आवाजें सुनाई दीं. वह खुश हो गई कि ये लोग लौट आये. वह हांगी की ओर लौटी. बस अब उसे दहकते पत्थरों पर पानी का छींटा दे कर पकने को मांस और तरकारी रखना थी. जब तक नाव किनारे आएगी खाना भी तैयार हो जाएगा.
वह घर के अंदर गई पानी का तुंबा लेने. अरे तुंबा तो ख़ाली पड़ा था. अंदर पानी के बर्तन सब ख़ाली थे.
“ओह ये तो बड़ी गड़बड़ हो गई, खैर अब भी वक़्त है मैं झटपट झरने तक जा कर पानी ले आऊं ” उसने सोचा और तुंबा उठा कर झरने की ओर तेज़ क़दमों से चल पड़ी. झरना ज़्यादा दूर नहीं था. रात हो चुकी थी इसके बावज़ूद वह रास्ता साफ़-साफ़ देख पा रही थी क्योंकि हर जगह सफ़ेद चांदनी छिटकी हुई थी. ज़रा सी देर में ही वह रास्ते के लगभग आखिरी सिरे तक जा पहुंची.
अचानक चांद बादल के एक टुकड़े के पीछे जा छिपा. पल में ही घुप्प अंधेरा हो गया. हाथ को हाथ न सूझे. रोना को कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था. वह अंदाज़ से आगे बढ़ी और एक पेड़ की ज़मीन से बाहर उठ आई जड़ से टकरा कर गिर पड़ी. उसकी ठुड्डी एक पत्थर से जा टकराई खून निकल आया. दर्द की तेज़ लहर ने रोना को रुला दिया. स्वाभाविक था कि उसे चांद पर गुस्सा आ गया. उसने चांद को एक मोटी सी गाली दी “पोकोकोहुआ” (Pokokohua) यानि तेरा मुंह झुलस जाए.
चांद ने गाली सुनी तो उसे बड़ा गुस्सा आया. वह बादल की ओट से निकला, ज़रा सा झुका, हाथ बढ़ा कर रोना की बांह पकड़ी और उसे ऊपर खींच उठा. रोना घबरा गई. बचने के लिए उसने पास ही खड़े नायो (Ngaio) पेड़ की डाली थाम ली. चांद ने और ज़ोर से रोना को ऊपर खींचा और रोना की पकड़ भी डाली पर और कड़ी हो गई. लेकिन भला चांद की ताक़त से जीत पाती रोना? चांद ने इतनी ज़ोर से खींचा कि रोना तो रोना उसके साथ नायो का पूरा पेड़ तक उखड कर ऊपर जा पहुंचा.
उधर दूसरी ओर इतनी देर में नाव किनारे आ लगी. उसके पति और बच्चों ने देखा कि घर के आगे हांगी में से लपटें उठ रही हैं, पास ही बिना पका कच्चा सामान पड़ा है और रोना का दूर-दूर कोई नामो निशान नहीं. उन्होंने खूब आवाज़ें दीं, आसपास खोजा पर सब व्यर्थ. अचानक एक बेटे की नज़र चांद पर पड़ी, वह चिल्लाया, “ऊपर देखो, फाया (Whaea यानि मां) तो चांद में है. उसके पति ने देखा तो समझ गया कि हो न हो आज रोना को अपने गुस्से का फल भुगतना पड़ा है. बस उस दिन से आज तक जब भी पूनम का चांद निकलता है उसमें रोना दिखाई देती है -एक हाथ में नायो पेड़ और एक हाथ में तुंबा पकड़े हुए.
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