– बाबूलाल दाहिया
- बाबूलाल दा
जिस प्रकार झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत शोरेन ने बड़े-बड़े धुरंधर राजनीतिज्ञों के तरह-तरह के फरेबों को धूल चटा कर अपने स्वयं के बूते वहां सरकार बनाई है तो वर्ग सहानुभूति के नाते यहां के भी तमाम आदिवासियों में खुशी की लहर दौड़ना स्वाभाविक है. मध्य प्रदेश में तो सर्व विदित ही है कि यहां सत्ता तक पहुंचने के लिए sc, st अथवा obc वर्ग के नेताओं को किसी न किसी पार्टी की कठपुतली बनकर अपनी चोटी उनके हाथ देने से ही सत्ता सुख मिलता है. वही स्थिति पहले झारखंड में भी थी परंतु यह शायद पहली बार हुआ है जब वहां के आदिवासी समुदाय के किसी नेता ने लालू, मुलायम सिंह के तर्ज पर खुद अपने बूते चुनाव लड़ा और सहयोगियों तक को सफलता दिलाई.
कुछ कोल समुदाय के दोस्तों ने आज मुझसे प्रश्न किया है कि ” दाहिया जी, एक लेखक के नाते इसमें आपका क्या कथन है? हमारी यहां की कोलारियन संस्कृति एवं मुंडारी में कितनी साम्यता है?” विगत तीन वर्ष पहले जब मैंने कोल आदिवासी समुदाय का समग्र सांस्कृतिक सर्वेक्षण किया था तो बहुत सारी बातें निकल कर आईं थीं. वैसे हमारे मध्य प्रदेश में जनजातियों के दो वंश मूल हैं. पहला आस्ट्रिक मुंडा समूह और दूसरा द्रविड़ मूल. बाकी आदिवासी तो द्रविण मूल के ही हैं पर विंध्य व महाकौशल के कोल एवं बैतूल के कोरकू इसी आष्टिक मुंडा समूह के माने जाते हैं जिनकी बोली कभी कोलारियन रही होगी. पर अब उसका नाम भी कोलारियन के बजाय मुंडारी हो गया है. मेरे पूर्व के तमाम विद्वानों के सर्वेक्षण से यही बात निकल कर आई है कि कोलारियन मुंडा समूह में काफी साम्यता है.
भाषाई दृष्टि से भी देखा जाय तो भारत में चार भाषाई समूह ही हैं जिनके अंतर्गत अन्य समस्त भाषाएं आती हैं. वे हैं-
1. आष्टिक
2. तिब्बती
3. द्रविड़
4. भारोपीय
पर कुछ विद्वानों का मत है कि 1854 में मूलर नामक एक विद्वान ने आष्टिक वर्ग की कोलरियन भाषा को मुंडारी इसलिए लिख दिया था कि (कोल) संस्कृत भाषा का शूकरार्थी नाम था इसलिए वह उन्हें अटपटा सा लग रहा था. जबकि यहां के प्राचीनतम निवासी कोल्हान क्षेत्र से आए कोल के अर्थ और बाद में यहां अस्तित्व में आई भारोपियन भाषा के उस नाम से कोई दूर-दूर का नाता भी नहीं था और पहले तो यहां की कोलारियन भाषा ही थी.
पर कुछ विद्वानों का मत है कि 1854 में मूलर नामक एक विद्वान ने आष्टिक वर्ग की कोलरियन भाषा को मुंडारी इसलिए लिख दिया था कि (कोल) संस्कृत भाषा का शूकरार्थी नाम था इसलिए वह उन्हें अटपटा सा लग रहा था. जब कि यहां के प्राचीनतम निवासी कोल्हान क्षेत्र से आए कोल के अर्थ और बाद में यहां अस्तित्व में आई भारोपियन भाषा के उस नाम से कोई दूर-दूर का नाता भी नहीं था और पहले तो यहां की कोलारियन भाषा ही थी.
यहां कोलों को गौटिया कहा जाता है जो मुखिया का समानार्थी है. लेकिन मुंडा का अर्थ भी झारखंड में मुखिया ही होता है. इसलिए मुंडा और कोल में अब भी काफी समानता है. कोलों का प्रदुर्भाव तत्कालीन बंगाल के सिंहभूमि यानी कि वर्तमान (उड़ीसा,झारखंड) के सीमा वाले भू-भाग कोल्हान से माना जाता है. यह वही कोल्हान है जहां के अभी 24 निर्वाचन क्षेत्र से चम्पई शोरेन अपने प्रभाव का दावा कर रहे थे और कई बार चुनाव के समय वह नाम टीवी में आता भी रहा है. प्राचीन समय से उसी कोल्हान क्षेत्र से आया कोल समुदाय मध्य प्रदेश के तेईस और उत्तर प्रदेश के नौ जिलों में पाया जाता है. रीवा,सतना,सीधी, उमरिया, कटनी, जबलपुर आदि सात-आठ जिलों में उसकी संख्या सर्वाधिक है.

आज भले ही यहां इनकी कोई अपनी भाषा न हो पर उत्तर-मध्य भारत के बहुत बड़े भू-भाग में बसने के कारण प्राचीन समय में कोलों की उसी प्रकार अपनी एक अलग भाषा रही होगी जैसे तमाम जातियों के बीच बस कर भी बैतूल एवं छिंदवाड़ा का कोरकू समुदाय अपनी अलग भाषाई पहचान बनाए हुए है. झारखंड में बहुत बड़ी संख्या होने के कारण वहां तो मुंडाओं की भाषा मुंडारी पूरी तरह मौजूद है एवं उस पर वहां के कुछ विश्व विद्यालयों में शोध भी हो रहे हैं. लेकिन मध्य प्रदेश के जिन जिलों में कोल समुदाय सर्वाधिक संख्या में पाया जाता है वहां वे अपनी भाषा ही भूल चुके हैं. यही कारण है कि रिश्तेदारियों में भी वे अन्य समुदायों की तरह ही अपने संबंधियों को “भाई, दीदी, दादा, दाई, बाबा, फूफू, फूफा,भउजी, काकी, बइया, बहनोई, मामा, काका, मौसी, मौसिया” आदि कह कर ही संबोधित करते हैं. इनमें कितने शब्द उनकी कोलारियन भाषा के हैं और कितने बाहर से लाए लोगों के हैं? यह बहुत बड़े शोध का विषय है. पर इसके बावजूद भी जब वे अपने ससुर, सासू या बहन के ससुर-सासू से मिलते हैं तो अन्य समुदायों से अलग (राउत या रउताइन) कह कर ही उनका संबोधन होता है. इस तरह उनकी कोलारियन भाषा का वह अवशेष कुछ न कुछ संदेश दे ही जाता है. गौटिन, गौटिया तो कोलारियन भाषा के शब्द ही हैं.
कोल अपने समधी से अन्य समुदायों के पलागो या नमस्कार, प्रणाम के बजाय आज भी (जोहार) कहकर मिलते हैं. अस्तु यह भी उनकी पुरानी कोलारियन भाषा का ही अवशेष लगता है. क्योकि यही अभिवादन झारखंड में भी पाया जाता है. पहले कई कार्यशालाओं में तो झारखंड के तमाम मित्र जब मुझसे मिलते थे तो यही अभिवादन किया करते थे. बाद में यहां कोलों की भाषा के बदलाव का कारण शायद यह हो सकता है कि कोल समुदाय अपनी अधिक संख्या वाले जिलों के घने जंगली क्षेत्र के बजाय उसके किनारे वाले क्षेत्र में अपना रहवास बनाया और लंबे समय तक जंगल की लकड़ी लाकर किसी कस्बे में बेंच या फिर किसानों की खेती में सहयोगी की भूमिका से अपनी अजीविका चलाई. शायद यही कारण है कि तमाम जातियों के नजदीकी संपर्क के कारण कोलों ने अन्य समुदायों की भाषा भी अपना ली.
इस तरह इनकी अपनी प्राचीन बोली भाषा तो स्पष्ट नहीं है?
पर हो सकता है यहां के प्राचीनतम रहवासी होने के कारण वर्तमान बुंदेली, बघेली या कटनी में बोली जाने वाली बघेली बुंदेली का मिला-जुला रूप पचेली में कुछ उसके अवशेष हों? क्योंकि बघेल या बुंदेला राजपूत खुद तो बाहर से आए थे पर अपनी भाषा लेकर वहां से नही आये थे और इसी तरह बांदा की गहोरी के मूल में भी इनकी बोली के कुछ अवशेष हो सकते हैं. फिर भी झारखंड के मुंडा और यहां के कोलारियन संस्कृति में बहुत कुछ साम्यता आज भी है.